फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

जालना ग्राउंड रिपोर्ट: आरक्षण की आग और जातियों के जाल में उलझे समीकरण, जालना में कमल खिलाने निकले दानवे

विजय गुप्ता Published by: जलज मिश्रा Updated Thu, 09 May 2024 06:56 AM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
अमर उजाला ग्राउंड रिपोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

मराठवाड़ा का जालना संसदीय क्षेत्र दो कारणों से अहमियत रखता है। एक तो यह कि उस आंदोलन का केंद्र रहा है, जहां से उठी आरक्षण की आग की लपटों में पूरा मराठवाड़ा ही नहीं, बल्कि महाराष्ट्र झुलस गया था। दूसरा यह कि मराठा विरोध के बीच भाजपा सांसद व केंद्रीय राज्य मंत्री राव साहेब दानवे के लिए जीत का छक्का लगाना चुनौती है। यहां मराठा व ओबीसी वोटों का विभाजन होना तय है और यही उलटफेर कर सकता है।

आरक्षण की मांग को लेकर अंतरावाली सराटी गांव में भूख हड़ताल पर बैठे मनोज जारांगे पाटिल का समर्थन करने के लिए एकत्र लोगों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया था, जिसके कारण मराठा आरक्षण आंदोलन फिर से शुरू हो गया। मराठों का गुस्सा काफी हद तक सत्ताधारी पार्टियों के खिलाफ है। दानवे का राजनीतिक कौशल उनकी मदद कर सकता है, हालांकि उनकी चुनावी लड़ाई उतनी आसान नहीं होगी, जितनी पहले थी।

69 वर्षीय दानवे का मुकाबला कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कल्याण काले से है। दानवे ने काले को 2009 के लोकसभा चुनाव में 8,482 वोटों से हराया था। दो बार विधायक रहे 61 वर्षीय काले को उसके बाद विधानसभा चुनावों में भी हार का सामना करना पड़ा। तीन कार्यकालों को छोड़कर, भाजपा 1977 से जालना का प्रतिनिधित्व कर रही है। दानवे, जो अपने विवादास्पद बयानों के लिए जाने जाते हैं, ने 1999 से लगातार पांच बार निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया है। 2014 के बाद से उन्हें दो बार केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था।

दानवे को अपने किए काम, जनता से जमीनी जुड़ाव और मोदी के नाम पर विश्वास है। जनता इसे मानती भी है। 2014 में केंद्र में एनडीए की सरकार बनने के बाद उन्होंने केवल जालना ही नहीं, बल्कि मराठवाड़ा के लिए कई काम किए हैं। लातूर में रेल कोच फैक्टरी, रेलवे लाइन का विद्युतीकरण, जालना में ड्राई पोर्ट, रेलवे पिटलाइन के अलावा सड़कों के निर्माण जैसे कार्य लोग गिनाते हैं।

नाम न छापने की शर्त पर जालना के स्थानीय अखबार के एक पत्रकार कहते हैं कि दानवे तब भी जीतते गए, जब वे केंद्र में अपनी सरकार न होने के कारण कुछ नहीं करा पाए। अब तो दस साल में उन्होंने बहुत काम करवा दिए हैं। वह बहुत चकवा (कुछ भी उलटफेर करने वाले) हैं। जालना के मामा चौक पर चाय की दुकान करने वाले सुनील काकड़े कहते हैं कि ऊपर भाजपा की सरकार आएगी, तो यहां दूसरा क्यों चुनें। हमारे खासदार (सांसद) ने कई काम किए हैं। यह सड़कें ऐसी नहीं होतीं थीं, जैसी अब हैं। पहले गड्ढे ही गड्ढे होते थे। एक निजी कंपनी में सेल्स अफसर महादेव टाले कहते हैं कि कांग्रेसी किसी से मिलते नहीं, दानवे के भाई भास्कर दानवे यहीं रहते हैं और लोगों से जुड़े हैं। बेटे संतोष दानवे भोकरदन के एमएलए हैं, राव साहेब खुद न भी मिल पाएं, तो यह दो तो हैं ही। बुजुर्ग रामेश्वर शिंदे कहते हैं कि कल्याण तो 2009 के बाद से गायब ही थे, अब मैदान में आए हैं।

कल्याण काले कहते हैं कि 2009 में जो थोड़ा अंतर रह गया था, वह दूर होगा। दानवे के विकास के दावे खोखले हैं। 2009 में ही उन्होंने लीड ली थी, वह भी मोदी के नाम पर। अब मोदी लहर खत्म है। इस पर राव साहेब के बेटे संतोष दानवे कहते हैं कि तब से लेकर अब तक बहुत कुछ बदल गया है। हम बहुत आगे निकल चुके हैं। मराठा फैक्टर को राज्य का मुद्दा मानते हुए वह कहते हैं कि खुद आंदोलन के मुखिया मनोज जरांगे पाटिल कह चुके हैं कि वह लोकसभा चुनाव के बाद अगली रणनीति बनाएंगे। तब तक कुछ नहीं।

जातीय समीकरण ही सबसे अहम


केंद्रीय मंत्री ने पिछले दो चुनावों में 55% से अधिक वोटों के भारी अंतर से जीत हासिल की है, लेकिन कांग्रेस उम्मीदवार काले ने उनके सामने चुनौती पेश की है। दोनों प्रमुख उम्मीदवार मराठा हैं। मराठा आंदोलन कार्यकर्ता और सरपंच मंगेश साबले ने भी नामांकन दाखिल किया है। इसलिए मराठा वोटों का विभाजन होगा। वंचित बहुजन अघाड़ी के उम्मीदवार प्रभाकर बकले धनगर समाज के वोट ले सकते हैं। मराठा मोर्चा के वीरेंद्र पवार भी हैं। 

ओबीसी भाजपा का परंपरागत वोट बैंक है और मराठा आंदोलन के कारण ओबीसी वर्ग भी इकट्ठा हुआ है। मुस्लिम वोट बैंक कांग्रेस का रहा है। ओबीसी बहुजन पार्टी के डॉ. तानाजी भोजनी भी ताल ठोक रहे हैं। कुल मिलाकर जालना में जातियों के जाल में सभी दल फंस गए हैं। 

  • जातीय भागीदारी 
  • ओबीसी    30% 
  • मराठा      19 %
  • मुस्लिम     18 %
  • बौद्ध     17 % 
  • दलित-अन्य     16 %

 छह विधानसभा क्षेत्रों में से तीन भाजपा के पास, दो शिवसेना के शिंदे गुट के पास और एक कांग्रेस के पास है।

बीज केंद्र व इस्पात नगरी में किसानों का भी मुद्दा


जालना को बीज केंद्र के रूप में जाना जाता है और यहां एक विशाल इस्पात उद्योग है। ड्राइपोर्ट बनने से इन्हें फायदा होगा। जालना के साथ ही लगते देवमूर्ति गांव के सरपंच व किसान सैयद कलीम कहते हैं कि किसानों को कपास का उचित दाम नहीं मिलता। वहीं भोकरदन में कपास की खरीद करने वाले बुजुर्ग कलीम खान कहते हैं कि किसान उन्हें ही कपास बेचते हैं। पचास से साठ रुपये किलो। थोड़े से मार्जिन से वह आगे बेच देते हैं।

पिछले दो चुनावों का हाल

2019

उम्मीदवार- मत%

  • रावसाहेब दानवे  57.78
  • विलास औताडे  30.23

2014

उम्मीदवार  मत%

  • रावसाहेब दानवे    55.47
  • विलास औताडे   36.07
विज्ञापन
विज्ञापन
Next