मराठवाड़ा का जालना संसदीय क्षेत्र दो कारणों से अहमियत रखता है। एक तो यह कि उस आंदोलन का केंद्र रहा है, जहां से उठी आरक्षण की आग की लपटों में पूरा मराठवाड़ा ही नहीं, बल्कि महाराष्ट्र झुलस गया था। दूसरा यह कि मराठा विरोध के बीच भाजपा सांसद व केंद्रीय राज्य मंत्री राव साहेब दानवे के लिए जीत का छक्का लगाना चुनौती है। यहां मराठा व ओबीसी वोटों का विभाजन होना तय है और यही उलटफेर कर सकता है।
आरक्षण की मांग को लेकर अंतरावाली सराटी गांव में भूख हड़ताल पर बैठे मनोज जारांगे पाटिल का समर्थन करने के लिए एकत्र लोगों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया था, जिसके कारण मराठा आरक्षण आंदोलन फिर से शुरू हो गया। मराठों का गुस्सा काफी हद तक सत्ताधारी पार्टियों के खिलाफ है। दानवे का राजनीतिक कौशल उनकी मदद कर सकता है, हालांकि उनकी चुनावी लड़ाई उतनी आसान नहीं होगी, जितनी पहले थी।
69 वर्षीय दानवे का मुकाबला कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कल्याण काले से है। दानवे ने काले को 2009 के लोकसभा चुनाव में 8,482 वोटों से हराया था। दो बार विधायक रहे 61 वर्षीय काले को उसके बाद विधानसभा चुनावों में भी हार का सामना करना पड़ा। तीन कार्यकालों को छोड़कर, भाजपा 1977 से जालना का प्रतिनिधित्व कर रही है। दानवे, जो अपने विवादास्पद बयानों के लिए जाने जाते हैं, ने 1999 से लगातार पांच बार निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया है। 2014 के बाद से उन्हें दो बार केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था।
दानवे को अपने किए काम, जनता से जमीनी जुड़ाव और मोदी के नाम पर विश्वास है। जनता इसे मानती भी है। 2014 में केंद्र में एनडीए की सरकार बनने के बाद उन्होंने केवल जालना ही नहीं, बल्कि मराठवाड़ा के लिए कई काम किए हैं। लातूर में रेल कोच फैक्टरी, रेलवे लाइन का विद्युतीकरण, जालना में ड्राई पोर्ट, रेलवे पिटलाइन के अलावा सड़कों के निर्माण जैसे कार्य लोग गिनाते हैं।
नाम न छापने की शर्त पर जालना के स्थानीय अखबार के एक पत्रकार कहते हैं कि दानवे तब भी जीतते गए, जब वे केंद्र में अपनी सरकार न होने के कारण कुछ नहीं करा पाए। अब तो दस साल में उन्होंने बहुत काम करवा दिए हैं। वह बहुत चकवा (कुछ भी उलटफेर करने वाले) हैं। जालना के मामा चौक पर चाय की दुकान करने वाले सुनील काकड़े कहते हैं कि ऊपर भाजपा की सरकार आएगी, तो यहां दूसरा क्यों चुनें। हमारे खासदार (सांसद) ने कई काम किए हैं। यह सड़कें ऐसी नहीं होतीं थीं, जैसी अब हैं। पहले गड्ढे ही गड्ढे होते थे। एक निजी कंपनी में सेल्स अफसर महादेव टाले कहते हैं कि कांग्रेसी किसी से मिलते नहीं, दानवे के भाई भास्कर दानवे यहीं रहते हैं और लोगों से जुड़े हैं। बेटे संतोष दानवे भोकरदन के एमएलए हैं, राव साहेब खुद न भी मिल पाएं, तो यह दो तो हैं ही। बुजुर्ग रामेश्वर शिंदे कहते हैं कि कल्याण तो 2009 के बाद से गायब ही थे, अब मैदान में आए हैं।
कल्याण काले कहते हैं कि 2009 में जो थोड़ा अंतर रह गया था, वह दूर होगा। दानवे के विकास के दावे खोखले हैं। 2009 में ही उन्होंने लीड ली थी, वह भी मोदी के नाम पर। अब मोदी लहर खत्म है। इस पर राव साहेब के बेटे संतोष दानवे कहते हैं कि तब से लेकर अब तक बहुत कुछ बदल गया है। हम बहुत आगे निकल चुके हैं। मराठा फैक्टर को राज्य का मुद्दा मानते हुए वह कहते हैं कि खुद आंदोलन के मुखिया मनोज जरांगे पाटिल कह चुके हैं कि वह लोकसभा चुनाव के बाद अगली रणनीति बनाएंगे। तब तक कुछ नहीं।
जातीय समीकरण ही सबसे अहम