भारत में चुनाव होली, दीपावली, बैसाखी, ईद या क्रिसमस जैसे त्योहारों से कतई कम नहीं माने जाते। सफेद पोशाक के पीछे सत्ता की सतरंगी दुनिया की चकाचौंध इतनी ज्यादा है कि किसी भी पार्टी का हर कार्यकर्ता पहले दिन से ही नेता बनने के सपने बुनने लगता है। मगर, जनता को जब भी मौका मिलता है, मौकापरस्त, मतलबी व छद्म राजनीतिज्ञों को आईना दिखा देती है। आजादी के बाद जैसे-जैसे हमारा लोकतंत्र जवां होता गया, मतदाता जागरूक होते गए और स्वार्थसिद्धि के लिए मैदान में उतरने वाले नेताओं को जमानत बचाना मुश्किल हो गया। पिछले 17 लोकसभा चुनावों में 91,160 प्रत्याशी किस्मत आजमा चुके हैं। इनमें से 71,246 यानी 78 प्रतिशत की जमानत जब्त हो गई। यूं कहें कि पांच में से चार से भी अधिक प्रत्याशी जमानत नहीं बचा पाए।
13952 प्रत्याशी उतरे, किसी एक चुनाव में सबसे अधिक
चुनाव लड़ने का ऐसा शौक कि वर्ष 1996 में हुए 11वें लोकसभा चुनाव में 543 सीटों के लिए 13,952 प्रत्याशी मैदान में उतर आए। यह अब तक रिकॉर्ड है। हालांकि इनमें से 91 फीसदी की जमानत भी न बच सकी। पहले चुनाव (1951-52) की बात करें, तो इसमें 40 प्रतिशत प्रत्याशियों की जमानत जब्त हुई थी। इस चुनाव में कुल 1,874 प्रत्याशी खड़े हुए थे, जिनमें 754 जमानत नहीं बचा पाए।
सर्वाधिक बसपा प्रत्याशियों ने गंवाई जमानत, कांग्रेस दूसरे नंबर पर
2019 में 86 प्रतिशत प्रत्याशियों की जमानत जब्त हुई। सर्वाधिक बसपा के रहे। बसपा के 383 में से 345 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई। कांग्रेस के 421 प्रत्याशियों में से 148 जमानत भी नहीं बचा पाए। भाजपा के 51 व भाकपा के 41 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई।
जमानत जब्त होने का मतलब
चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक, प्रत्याशी के लिए कुल डाले गए मतों का छठा हिस्सा, यानी 0.166 प्रतिशत मत हासिल करना जरूरी है। ऐसा नहीं होने पर प्रत्याशी की जमानत राशि सरकारी कोषागार में चली जाती है। वर्ष 1951 में सामान्य प्रत्याशियों के लिए जमानत राशि 500 रुपये व अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति के लिए 250 रुपये थी। वर्तमान में यह सामान्य के लिए 25 हजार व अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए 12,500 हो गई है। जमानत राशि को आमतौर पर प्रत्याशी की प्रितष्ठा से जोड़कर भी देखा जाता है।
बड़ी वजहें...वोटकटवा, डमी व जुनून
दिल्ली विश्वविद्यालय के महाराजा अग्रसेन कॉलेज के प्राचार्य प्रो. संजीव कुमार तिवारी कहते हैं, प्रत्याशियों की संख्या अधिक होने की प्रमुख वजह डमी कैंडिडेट हैं। ये सामान्य तौर पर बड़ी पार्टियों की तरफ से खड़े किए जाते हैं। प्रत्याशी सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए विरोधी के समानांतर ऐसे व्यक्ति को खड़ा कर देते हैं, जो जीतने का सामर्थ्य तो नहीं रखता, लेकिन वोट काटने की क्षमता रखता है। एक बड़ी वजह यह भी है कि चुनाव प्रबंधन एक व्यवस्थित उद्योग का रूप लेता जा रहा है। यह उद्योग सूचना तकनीक व अन्य संसाधनों के जरिये लोगों को प्रभावित करता है। ऐसे में कमजोर प्रत्याशियों के प्रति जनता के मन में गुंजाइश कम रह जाती है।