लोकसभा चुनाव के लिए सभी पार्टियां अपने उम्मीदवारों का एलान कर रही हैं। कई सीटों पर प्रत्याशी तय हो चुके हैं। पहले दो चरण के लिए नामांकन की प्रक्रिया भी पूरी हो गई है। वहीं, उत्तर प्रदेश की अमेठी और रायबरेली सीट पर अब तक कांग्रेस उम्मीदवारों का घोषित नहीं होना चर्चा में है। सवाल उठा रहा है कि क्या नेहरू-गांधी परिवार से ही इन सीटों पर उम्मीदवार घोषित किए जाएंगे या कोई और कांग्रेस का उम्मीदवार होगा? आखिर प्रत्याशी के एलान में कांग्रेस इतनी देरी क्यों कर रही है? रायबरेली में भाजपा ने अब तक उम्मीदवार क्यों नहीं उतारा?
इस हफ्ते के ‘खबरों के खिलाड़ी’ में इन्हीं सवालों पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, पूर्णिमा त्रिपाठी, अवधेश कुमार और अनुराग वर्मा मौजूद रहे।
अवधेश कुमार: 2019 में राहुल गांधी अमेठी से हार गए। रायबरेली लोकसभा में आने वाली विधानसभाओं के 2022 के नतीजे भी देखेंगे तो पता चलेगा की यह कांग्रेस का गढ़ नहीं रहा। इस वक्त यही संदेश जा रहा है कि नेहरू-गांधी परिवार ने इस क्षेत्र को छोड़ दिया है। अमेठी और रायबरेली में कांग्रेस पार्टी को और खासतौर पर गांधी-नेहरू परिवार को जाकर खुद घोषणा करनी चाहिए थी हम चाहे हारें, चाहे जीतें, हम यहां से लड़ते रहेंगे। ऐसा नहीं करके गांधी-नेहरू परिवार ने बड़ी भूल कर दी है।
अनुराग वर्मा: इस वक्त पूरी कांग्रेस पार्टी में असमंजस की स्थिति है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पूरी तरह अदृश्य हो चुकी है। जमीन पर उनके लिए कुछ नहीं है, बस अखबारों और टीवी पर जरूरी नजर आ जाती है। अब तक तो ऐसा ही रहा है कि इस चुनाव में इन्होंने अमेठी और रायबरेली को छोड़ सा दिया है। 2019 में राहुल इतने अंतर से नहीं हारे थे कि उसे पाटा नहीं किया जा सके। वहीं, रायबरेली से सोनिया भी इतने अंतर से नहीं जीतीं थीं कि उन्हें हराया नहीं जा सके। दोनों सीटें फिफ्टी-फिफ्टी पर थीं। सोनिया गांधी ने अचानक से चुनाव नहीं लड़ने का फैसला तो किया नहीं होगा। अगर यह तय था तो रायबरेली के लिए आगे कौन उम्मीदवार होगा, इसकी योजना क्या थी? अमेठी से हारने के बाद राहुल गांधी ने जिस तरह उसे छोड़ दिया, उस पर भी सवाल है।
विनोद अग्निहोत्री: अब तक कांग्रेस ने दोनों सीटों पर उम्मीदवार घोषित नहीं किए तो इसके क्या संकेत हैं। अगर परिवार को यह सीट छोड़नी होती तो उम्मीदवार घोषित हो चुका होता। मेरा मानना है कि अमेठी और रायबरेली से राहुल और प्रियंका ही चुनाव लड़ेंगे। स्थानीय कार्यकर्ताओं को इसका संदेश भी दे दिया गया है। अमेठी और रायबरेली से कांग्रेस अगर हारती है तो कोई पहली बार नहीं हारेगी। यहां से पहले भी कांग्रेस चुनाव हार चुकी है। मेरा मानना है कि वायनाड में मतदान होने के बाद दोनों की उम्मीदवारी की घोषणा होगी।
पूर्णिमा त्रिपाठी: पार्टी एक रणनीति के तहत इन सीटों पर उम्मीदवार का एलान नहीं कर रही है। गांधी परिवार के एक और चेहरे रॉबर्ट वाड्रा भी अमेठी से लड़ने की इच्छा जता चुके हैं। शायद इस वजह से परिवार में चर्चा चल रही होगी कि कौन चुनाव लड़ेगा। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस अपनी जमीन खुद खत्म करती जा रही है। 1996 में मायावती से जब गठबंधन हुआ था, तब बसपा ने उन्हें मात्र 100 सीटें दी थीं। एक तरह से कांग्रेस खुद ही उत्तर प्रदेश में अपनी जमीन खत्म कर रही है।
रामकृपाल सिंह: आज की तारीख में भाजपा का कोई विकल्प बन सकता है तो वह कांग्रेस ही है। जिस उत्तर प्रदेश से जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी सब जीतते रहे, वहां कांग्रेस 34 साल से सत्ता से बाहर है। यहां पार्टी का संगठन खत्म हो चुका है। जब आपने खेत जोता ही नहीं, बीज बोए ही नहीं, तो आप फसल की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। विपक्षी गठबंधन के तहत पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, दिल्ली और पंजाब की 230 सीटों में से कांग्रेस महज 46 सीटों पर लड़ रही है। कांग्रेस का कमजोर होना लोकतंत्र के लिए अच्छी बात नहीं है।