शेख मुजीबुर रहमान ने 1972 में सत्ता संभाली और युद्ध से तहस-नहस बांग्लादेश के पुनर्निर्माण के कार्यों में जुट गए। लेकिन 1975 आते-आते चीजें बिगड़ने लगी। भ्रष्टाचार बढ़ने लगा और भाई-भतीजावाद को शह मिलने लगी। सेना में असंतोष इतना बढ़ने लगा कि कुछ जूनियर अफसरों ने 15 अगस्त, 1975 की सुबह शेख के 32 धनमंडी स्थित आवास पर हमला बोल दिया। गोलीबारी को सुन शेख सीढ़ियों से नीचे आ रहे थे कि उनपर और उसके बाद उनके परिवार के सदस्यों पर गोली चलाई गई। 16 अगस्त की सुबह सैनिकों ने सारे शवों को इकट्ठा किया और मुजीब को छोड़ कर सबको बेनानी कब्रिस्तान में एक बड़े गड्ढे में दफना दिया। मुजीब के शव को हेलीकॉप्टर से उनके पैतृक गांव टांगीपारा ले जाया गया। उनके पिता की कब्र के बगल में दफना दिया गया। अपने पिता की हत्या के बाद शेख हसीना हिन्दुस्तान रहने लगी थीं। वहीं से उन्होंने बांग्लादेश के नए शासकों के खिलाफ अभियान चलाया। 1961 में वह बांग्लादेश लौटीं और सर्वसम्मति से अवामी लीग की अध्यक्ष चुन ली गई।
मुजीबुर रहमान की हत्या में शामिल रहे अब्दुल माजिद को 1998 में बांग्लादेश की एक निचली अदालत ने फांसी की सजा सुनाई थी। 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा था और 13 अप्रैल 2020 को ढाका की सेंट्रल जेल में माजिद को फांसी दे दी गई।