आईपीसी की धारा 124ए के तहत अगर कोई व्यक्ति अपने लेख, भाषण आदि के माध्यम से भारत सरकार के खिलाफ नफरत फैलाने या भड़काने की कोशिश करता है, तो उसे तीन साल तक की जेल हो सकती है। कुछ मामलों में आजीवन कारावास तक का दंड भी दिया जा सकता है। बता दें कि यहां भारत सरकार का मतलब संवैधानिक तरीकों से बनी सरकार है।
1962 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने केदारनाथ बनाम बिहार राज्य के मामले में राजद्रोह कानून की वैधता को बरकरार रखा था, लेकिन दायरा कम कर दिया था। कोर्ट ने कहा था, सरकार की आलोचना या प्रशासन पर टिप्पणी राजद्रोह नहीं है। राजद्रोह तभी है, जब कोई भी बयान ऐसा हो, जिसमें हिंसा फैलाने की मंशा हो या फिर हिंसा बढ़ाने के तत्व मौजूद हों। वर्ष 1995 में बलवंत सिंह मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने खालिस्तान के समर्थन में नारे लगाने वाले लोगों को भी इसी आधार पर छोड़ दिया था। कोर्ट का कहना था कि उन्होंने सिर्फ नारे लगाए थे, उनकी मंशा हिंसा की नहीं थी।
साल 2011 में कुंदन कॉलम न्यूक्लियर प्रोटेस्ट की वजह से 130 केस आईपीसी की धारा 124 ए के तहत दर्ज किए गए थे। वहीं वर्ष 2019 से 2020 तक सीएए कानून के खिलाफ प्रदर्शन, कोरोना महामारी और हाथरस रेप केस की वजह से क्रमश: 118 और 107 मामले दर्ज किए जा चुके हैं।