क्या होता है अविश्वास प्रस्ताव
- अविश्वास प्रस्ताव एक संसदीय प्रस्ताव है, जिसे सामान्य रूप से विपक्ष द्वारा किसी सरकार को हराने या कमजोर करने की उम्मीद से रखा जाता है। कुछ परिस्थितियों में सत्तारुढ़ सरकार के समर्थक भी अविश्वास प्रस्ताव ला सकते हैं, अगर उन्हें सरकार में विश्वास न हो।
- संविधान में अविश्वास प्रस्ताव का कोई जिक्र नहीं है। लेकिन अनुच्छेद 118 के तहत हर सदन अपनी प्रक्रिया बना सकता है। जबकि नियम 198 के तहत ऐसी व्यवस्था है कि कोई भी सदस्य लोकसभा अध्यक्ष को सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दे सकता है।
प्रस्ताव रखने के क्या हैं नियम
- अविश्वास प्रस्ताव पारित कराने के लिए सबसे पहले विपक्षी दल को लोकसभा अध्यक्ष को इसकी लिखित सूचना देनी होती है।
- इसके बाद स्पीकर उस दल के किसी सांसद से इसे पेश करने के लिए कहते हैं। यह बात सदन में तब उठती है जब किसी दल को लगता है कि सरकार सदन का विश्वास या बहुमत खो चुकी है।
कब स्वीकार होता है अविश्वास प्रस्ताव
- अविश्वास प्रस्ताव पारित कराने के लिए कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन हासिल होना चाहिए।
- लोकसभा अध्यक्ष या स्पीकर की मंजूरी मिलने के बाद 10 दिनों के अदंर इस पर चर्चा कराई जाती है।
- चर्चा के बाद स्पीकर अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में वोटिंग कराता है या फिर कोई फैसला ले सकता है।
पहली बार कब और किसके खिलाफ पेश हुआ था अविश्वास प्रस्ताव
भारतीय संसदीय इतिहास में पहली बार अविश्वास प्रस्ताव 1963 में पेश किया गया था। पंडित जवाहर लाल नेहरू की सरकार के खिलाफ इसे जेबी कृपलानी ने रखा था। तब इस प्रस्ताव के पक्ष में केवल 62 वोट और विरोध में 347 वोट पड़े थे। नेहरू की सरकार चलती रही थी।
किसके खिलाफ पेश हुए सबसे ज्यादा अविश्वास प्रस्ताव
- अब तक सबसे ज्यादा अविश्वास प्रस्ताव इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ पेश हुए हैं। इंदिरा के शासन काल में 15 बार अविश्वास प्रस्ताव पेश हुए।
- इसके अलावा लाल बहादुर शास्त्री और नरसिंह राव की सरकारों ने भी तीन-तीन बार अविश्वास प्रस्ताव का सामना किया।
- अविश्वास विपक्ष जबकि विश्वास प्रस्ताव हमेशा सत्ता पक्ष पेश करता है। यह केंद्र में प्रधानमंत्री और राज्य में मुख्यमंत्री पेश करता है। सरकार के बने रहने के लिए इस प्रस्ताव का पारित होना जरूरी है। प्रस्ताव पारित नहीं हुआ तो सरकार गिर जाएगी।
- जब सरकार को समर्थन देने वाले घटक समर्थन वापसी का ऐलान कर दें, तो विश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता है। राष्ट्रपति या राज्यपाल, प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को सदन का भरोसा हासिल करने के लिए कह सकते हैं।
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- अटल बिहारी वाजपेयी ने दो बार सदन में विश्वास मत हासिल करने की कोशिश की, लेकिन दोनों बार वे असफल रहे। 1996 में उन्होंने प्रस्ताव पर मतदान से पहले इस्तीफा दे दिया था। जबकि 1998 में सिर्फ एक वोट की कमी के कारण उनकी सरकार गिर गई थी।
- इनके अलावा वीपी सिंह, एचडी देवगौड़ा और आईके गुजराल की सरकारें भी विश्वास प्रस्ताव हार चुकी हैं।
लोकसभा में अब तक कितनी बार पेश हुआ अविश्वास प्रस्ताव