अध्ययन रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 2025 तक चीनी विश्वविद्यालय हर साल 77 हजार से अधिक स्टेम पीएचडी डिग्रियां देंगे। जबकि अमेरिका में ये संख्या तकरीबन 40 रहेगी। अगर अमेरिका में पढ़ने वाले विदेशी छात्रों की गिनती न की जाए, तब तो चीन से अमेरिका का फासला और भी बढ़ा हुआ दिखेगा। तब चीन में तीन गुना ज्यादा ऐसे डिग्रीधारी तैयार होते दिखेंगे।
अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि पहले चीन में मिलने वाली पीएचडी डिग्री की क्वॉलिटी पर सवाल उठाए जाते थे। लेकिन अब ऐसा लगता है कि इस दिशा में चीन में काफी सुधार हुआ है। इस बीच चीन में स्टेम डिग्री के लिए दाखिला लेने वाले छात्रों की संख्या 2015 में 59,039 थी, जो 2019 में 79,031 तक पहुंच गई। अध्ययनकर्ताओं ने ध्यान दिलाया है कि बात सिर्फ स्टेम की नहीं है। असल में चीन में जितने छात्र पीएचडी कर रहे हैं, उनमें 80 फीसदी विज्ञान और इंजीनियरिंग में हैं।
ज्वेत्सलूत ने अमेरिकी न्यूज वेबसाइट एक्सियोस.कॉम से कहा- ‘अगर ये ट्रेंड जारी रहा, तो ऐसा कई उपाय नहीं है, जिससे प्रतिभा के मोर्चे पर अमेरिका चीन का मुकाबला कर पाएगा। तब अकेला रास्ता विदेशी छात्रों के लिए यहां आना आसान करना होगा।’ लेकिन ये बड़ा सवाल है कि क्या अमेरिका में ऐसा किया जाएगा। ज्वेत्सलूत ने कहा कि कोविड-19 महामारी, अंतरराष्ट्रीय ग्रीन कार्ड को सीमित करने और कई दूसरे कारणों से अमेरिका में आने और यहां रुकने वाले विदेशी छात्रों की संख्या घट गई है।
अमेरिका में इस आव्रजन के खिलाफ तीखा माहौल है। दक्षिणपंथी राजनीतिक समूहों का आरोप है कि विदेशी छात्र अमेरिकियों की नौकरी हड़प लेते हैं। लेकिन अब चीन से पैदा हो रही चुनौती के कारण अमेरिका सरकार को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है।