पहले भी खारिज हो चुकी है याचिका
एनसीएलएटी के 17 अप्रैल आदेश के मुताबिक, बीसीसीआई की तरफ से दायर की गई यह अपील तभी वापस ली जा सकती है जब कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स (CoC) उसकी समीक्षा कर और आवश्यक अनुमति दे। उच्चतम न्यायालय ने यह भी नोट किया कि पहले ही जुलाई में उसने बीसीसीआई और ऋजु रवींद्रन (बायजु के छोटे भाई और सह-संस्थापक) द्वारा दायर अपीलों को खारिज कर दिया था, जो एनसीएलएटी के इसी आदेश के खिलाफ थीं।
सुनवाई के दौरान जस्टिस पारदीवाला ने नवीन पाहवा से पूछा कि एनसीएलएटी का वह नजरिया गलत कैसे हो सकता है, जो यह मानता है कि यदि CoC मामले की प्रगति के दौरान गठित हुई है, तो दावे के वापस लेने और निपटारे के पहलुओं को CoC की मंजूरी के साथ ही हल किया जाना चाहिए।
पाहवा ने तर्क दिया कि पहले दायर याचिका उस समय की गई थी जब CoC गठित नहीं हुई थी, यानी वह “प्री-CoC” चरण था और बाद में मामला चलने के दौरान ही CoC बनी। उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने बीसीसीआई का भुगतान अपनी जेब से किया है, लेकिन अब विवाद की पूरी स्थिति बदल चुकी है।
तर्क स्वीकार कर लें पूरी प्रक्रिया विफल: सुप्रीम कोर्ट
बेंच ने इस दलील से असहमत होकर कहा कि अगर वे पाहवा का तर्क स्वीकार कर लें तो पूरी प्रक्रिया ही विफल हो जाएगी। अदालत का रुख स्पष्ट रहा कि CoC की भूमिका और उसकी मंजूरी को दरकिनार नहीं किया जा सकता।
मामला के पृष्ठभूमि
बीसीसीआई ने 16 जुलाई 2024 को प्रायोजन के बकाये की वजह से थिंक एंड लर्न के खिलाफ दिवालियापन प्रक्रिया शुरू की। इसके बाद 31 जुलाई 2024 को दोनों पक्षों के बीच एक समझौता हुआ और ऋजु रवींद्रन ने बीसीसीआई के सम्पूर्ण दावे का भुगतान कर दिया।
2 अगस्त, 2024 को, एनसीएलएटी ने सेटलमेंट को स्वीकार कर लिया और कॉर्पोरेट इन्सॉल्वेंसी रिज़ॉल्यूशन प्रोसेस (CIRP) को वापस लेने की इजाजत दे दी, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 14 अगस्त, 2024 को इस ऑर्डर पर रोक लगा दी।
मौजूदा अपील में, रवींद्रन ने दलील दी थी कि एनसीएलटी (NCLT) ने 29 जनवरी, 2025 को सेटलमेंट को पोस्ट-CoC माना और निर्देश दिया कि विड्रॉल एप्लीकेशन को पैनल के सामने रखा जाए, जिसे एनसीएलएटी ने सही ठहराया।