ऊंचाई नापने की उमंग और पहाड़ों पर चढ़ने की ललक साथ लेकर बुलंदशहर के रहने वाले भूपेश ने विभिन्न पर्वतारोहियों के साथ लाहौल स्पीति स्थित 6310 मीटर ऊंची माउंट इंद्राना चोटी पर पिछले दिनों तिरंगा फहराया। 22 दिनों के अथक सफर के बाद उनको सफलता हाथ लगी।
इंडियन माउंटेनियरिंग फाउंडेशन (आईएमएफ) के निर्देशन में भूपेश ने अपने कदम आगे बढ़ाए हैं। भूपेश का मानना है कि लक्ष्य हमेशा बड़ा होना चाहिए। वह लक्ष्य कैसे मिलेगा, इस बारे में बाद में सोचना चाहिए। पेश है, पर्वतारोहण को ही अपना कॅरियर बनाने वाले भूपेश से एक मुलाकात :
आपका यह सफर कब शुरू हुआ?
लाहौल स्पीति में 6,310 मीटर ऊंची माउंट इंद्राना चोटी फतह करने के लिए 11 अगस्त को मनाली से मैंने आठ साथियों के साथ सफर शुरू किया था। इसके बाद रोहतांग, बातल, स्नॉट कैंप, बेस कैंप, सम्मिट कैंप होते हुए 22 दिनों बाद हम 3 सितंबर को चोटी पर पहुंचे और तिरंगा फहराया। आईएमएफ की ओर से मुझे इस टीम का लीडर बनाया गया था।
ऊंचाई से आपको डर नहीं लगता?
बचपन से पर्वतारोहियों के बारे में पढ़ा और सुना था। बछेंद्री पाल की कहानियों और किस्से सुने और उनको ही अपना आदर्श बनाया। ठान लिया था कि पर्वतों की ऊंचाइयों को नापना है। जब मन में संकल्प लिया तो डर निकल गया। हां, कई बार चढ़ाई करते समय कुछ परेशानियां जरूर होती हैं, लेकिन सावधानीपूर्वक और इंडियन माउंटेनियरिंग फाउंडेशन (आईएमएफ) के निर्देशों को ध्यान में रखा तो कोई समस्या नहीं होती।
आपकी टीम में कौन-कौन शामिल थे?
मेरी टीम में लोपसेंग शैप्रा, मनप्रीत, आकाश, विनोद, उदय, गौरव, चमन और इरान के हादी शामिल थे। सभी काफी सपोर्टिव रहे। किसी को समस्या होने पर सब संभाल लेते थे और आगे बढ़ते थे। अकेले की बजाय टीम के साथ चलने में मजा आता है।
इससे पहले आप कहां तक पहुंचे हैं?
इससे पहले मैं हिमालय स्थित गढ़वाल की 6353 मीटर, खांग शेरिंग की 6258 मीटर, फ्रेंडशिप पीक की 5640मीटर, कुमायूं की 6343 मीटर ऊंची चोटी को फतह कर चुका हूं। एक के बाद एक सफलता मिलती गई, तो हौसला बढ़ता चला गया।
आगे का क्या दरादा है?
अब मेरा अगला लक्ष्य है, 7070 मीटर ऊंची चोटी पर तिरंगा फहराना। उसके लिए तैयारी कर रहा हूं। जल्दी ही इस मिशन को शुरू करूंगा।
अपनी सफलता का श्रेय आप किसको देना चाहेंगे?
अपनी सफलता मैं अपने परिवार को समर्पित करना चाहूंगा। पर्वतारोहण के मेरे निर्णय को मेरे परिवार ने स्वीकार किया था, वरना सामान्यत: ऐसे कॅरियर विकल्प पर आसानी से सहममि नहीं बनती। परिवार के सदस्यों ने और आईएमएफ के लोगों ने खूब मदद की। आईएमएफ के प्रोग्राम को-ऑर्डिनेटर विनोद नेगी ने हमें कई निर्देश दिए और आखिरकार हमें सफलता मिली।