बंधुआ मजदूरी करते और कचरा बीनते इन बच्चों की हिम्मत और किस्मत ने किया कुछ ऐसा कि दुनिया कायल हो गई।
विकी रॉय की कहानी भी कमोबेश ऐसी ही है। 1999 में पश्चिम बंगाल के पुरुलिया के विकी मात्र 11 साल की उम्र में दिल्ली भाग आए। यहां रोटी पानी का जुगाड़ न मिला तो गरीब बच्चों के साथ मिलकर सड़कों से कचरा बीनने लगे। पेट भरने के लिए उन्होंने बोतले बेंची और कभी अजमेरी गेट पर ढाबे में बर्तन साफ किए।
फिर सलाम बालक ट्रस्ट की नजर विकी पर पड़ी औऱ उनके जीवन को दशा मिली। यहां रहकर विकी ने पढ़ाई की और मशहूर ब्रिटिश फिल्म मेकर डिक्सी बेंजामिन से फोटोग्राफी के गुर सीखे।
18 साल का होने के बाद विकी ने सलाम ट्रस्ट को अलविदा कहा और एक फोटोग्राफर के तौर पर नई पारी शुरू की।
आज विकी देश के जाने माने फोटोग्राफरों में से एक हैं और उनके फोटोग्राफी प्रशिक्षण संस्थान भी चल रहे हैं। उनके कई प्रोजेक्ट्स को अन्तरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं।
सौतेले पिता से बच कर भागा, लिखी खुद की किताब
पांच साल की उम्र में सौतेले पिता की मार से तंग आकर मुंबई भाग आए आमिन ने कई साल रेलवे स्टेशन पर ही बिता दिए। मुंबई के स्नेहासदन ने आमिन और उसकी बहन को सहारा दिया और पढ़ाया लिखाया। कुछ साल आमिन ने अखबार बेचे, गाड़ियां साफ की और छोटे मोटे काम भी किए।
18 साल के होने पर आमिन ने बतौर टैक्सी ड्राइवर और गाइड विदेशियों को मुंबई दर्शन करवाने शुरु किए और अपने हरदिल अजीज व्यवहार से वो विदेशी सैलानियों के प्रिय बन गए।
सैलानी मुंबई आते और आमिन के बचपन की कहानी सुनते, उनके संघर्ष सैलानियों को भाते और लोग जाते जाते आमिन को विदेश आने का भी ऑफर करते। आमिन ने इन विदेशियों से अंग्रेजी सीखी और कई दूसरे हुनर भी सीखे।
इन्हीं सैलानियों ने आमिन को सलाह दी कि अपने जीवन पर एक किताब लिखो। आमिन ने अपने जीवन के संघर्षों पर किताब लिखी। नाम था 'लाइफ इज लाइफ- आई एम बिकॉज ऑप यू' इटली के सहयोगियों ने उसे इतालवी में अनुवाद किया और कई अन्य सैलानियों ने आमिन का साथ देते हुए उनकी किताब का अलग अलग भाषाओं में अनुवाद किया।
इस किताब को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली। स्पेन और फ्रांस के रेडियो पर भी इसकी गहन चर्चा हुई और रॉयल्टी के तौर पर अमीन एक अमीर शख्सियत बन गए। एक ही साल में आमिन की किताब अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर बेस्ट सेलर के खिताब से नवाजी गई।
आज आमिन लिखते भी हैं और मुंबई में उनके रेस्त्रा चलते हैं।
बंधुआ मजदूर से बना योगा टीचर
2001 में नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी की टीम ने बिहार के सहरसा गांव नौ साल के एक मासूम को बंधुआ मजदूरी से मुक्त कराया। सुमन नाम के ये बच्चा एक साहूकार के यहां बंधुआ नौकर बनाकर बंद कमरे में रखा गया था।
दरअसल सुमन की मां ने साहूकार से कुछ कर्जा लिया और कर्ज न चुकाने की एवज में वो सुमन को साहूकार के यहां बंधुआ मजदूरी के लिए छोड़ने पर विवश हो गई।
साहूकार सुमन को मारता पीटता और नौ साल के मासूम को साहूकार के घर और खेत दोनों जगह काम करना पड़ता।
कैलाश की बचपन बचाओ आदोलन टीम ने सुमन को वहां से निकाला और बाल आश्रम में भरती कराया। वहां सुमन ने 12वीं तक की स्कूली शिक्षा पूरी की और फिर दिल्ली आ गया। दिल्ली में एक एनजीओ की मदद से सुमन ने योगा और ग्राफिक डिजाइनिंग में डिप्लोमा हासिल किया।
आज सुमन एक सफल योगा प्रशिक्षक हैं और इसी नौकरी की बदौलत उन्हें सम्मानजनक जीवन जीने का मौका मिला।
सुमन याद करते हैं कि साहूकार की कैद में वो सोचते थे कि कभी बाहर नहीं निकल पाएंगे लेकिन कैलाश की मदद और हौंसले के चलते एक मजबूर बच्चा एक जिम्मेदार नागरिक बन पाया।
गरीबी को हरा बनी कबड्डी खिलाड़ी
खुद ही सोचिए गरीबी की मार के चलते कई कई रातों को भूखा सोने वाले को पहले रोटी दिखेगी या कबड्डी। लेकिन गरीबी से हार न मानते हुए इन बहनों ने कबड्डी में देश का नाम रौशन किया औऱ परिवार का पालन भी किया।
मध्य प्रदेश के ग्वालियर से 28 किलोमीटर दूर जखारा गांव की दो बहनों सपना और प्रीति का घर इतना गरीब था कि वो भूखे पेट सो जाती थी।
एक दिन दोनों बहनों ने गांव के बाहर हो रहे कबड्डी मैच को देखा तो खेलने की ललक बढी। दोनों बहनें पूरे दिन भूखे पेट मैदान के बाहर खड़े होकर खेल देखा करती। उन्हें देखकर कोच की नजर उन पर पड़ी और उन्हें खेलने का मौका मिला। वो नंगे पैर से खेला करती थी क्योंकि उनके पास चप्पलों तक के पैसे नहीं थे।
लेकिन कोच की मदद से दोनों बहनों ने बेहतरीन प्रदर्शन जारी रखी और 2015 में उन्हें मुख्यमंत्री की तरफ से पुरस्कार भी दिया गया।
अब दोनों बहनें ओपन नेशनल कबड्डी के लिए तैयारी कर रही है और उन्हें राज्य सरकार का सहयोग भी मिल रहा है।
कई स्वयंसेवी संस्थानों की तरफ से मिली मदद से आज दोनों बहनों ने इतना मुकाम बना लिया है कि उनके घरवालों को गर्व होता है।