स्कूल शिक्षा पर एआई का क्या प्रभाव?
स्कूल शिक्षा पर एआई के प्रभाव पर चर्चा करते हुए डॉ. जयश्री पेरिवाल ने कहा कि अगर आप एआई को नहीं अपनाएंगे तो आप पीछे रह जाएंगे, चाहे वह स्कूल हो या कॉलेज हो, डॉक्टर हो या टीचर हो। हर एक को जिंदगी में जब बदलाव आता है तह उसको अपनाना चाहिए। आप उसको किस तरह से अपनाते हैं, यह एक विवेक का मामला है। एक टीचर, पैरेंट्स, स्कूल ऑनर्स उसको कैसे अपनाते हैं ये विवेक का मामला है।
एआई इज़ नॉट रिप्लेसिंग टीचर्स, इट इज ऑनली असिस्टिंग टीचर्स। ये टूल्स इसलिए बने कि किसी को मदद कर सकें। टीचर 3 घंटे लगाएगी एक वर्कशीट बनाने में, एक बच्चे को वह समझ में आ रहा है। दूसरा बच्चा है उसको सिर्फ विजुअली समझ ज्यादा आता है। कोई सोचता है कि मुझे बार-बार रिपिटेशन से ज्यादा समझ आता है। तो एक टीचर एआई की मदद से एक डिफ्रेंशिएटिंग शीट बनाएगी, जिससे सभी को समझ आ सके।
एआई का जन्म अमर उजाला से आठ साल बाद हुआ: प्रो. मनोज कपिल
एआई नया नहीं है, एआई का जन्म अमर उजाला से आठ साल बाद हुआ था। 1956 में बताया गया कि दुनिया में एआई नाम की कोई चीज है। उसका फिर धीरे-धीरे विस्तार होता चला गया।
सबसे पहले बच्चों को यह पता होना चाहिए कि एआई को कैसे इस्तेमाल करना है, एआई का कितना इस्तेमाल होना चाहिए, एआई कब इस्तेमाल करना है और एआई कब इस्तेमाल नहीं करना है। जब ये चार प्रश्न उनके दिमाग में घूमेंगे तो उनके दिमाग में इन चारों सवालों के जवाब स्पष्ट रहें।
एआई के नैतिक मूल्य बच्चों को सिखाए जाने चाहिए: प्रो. मनोज कपिल
अगर इसको सही दिशा में लिया जाए, तो यह चमत्कार करेगा। आने वाले 5 वर्षों में दुनिया में बहुत बड़ा बदलाव होने वाला है। जो एआई का इस्तेमाल नहीं जानता होगा वह पिछड़ जाएगा। एआई का इस्तेमाल करना बहुत जरूरी होगा, लेकिन इसके कुछ नैतिक मूल्य भी हैं, वो नैतिक मूल्य बच्चों को सिखाए जाने चाहिए।
उन्होंने सुभारती विश्वविद्यालय का उदाहरण देते हुए कहा, "मैं जिस विश्वविद्यालय से आता हूं, सुभारती विश्वविद्यालय मेरठ, हम उस विश्वविद्यालय में एआई को सब्जेक्ट की तरह नहीं पढ़ाते। हम पिछले दो साल से एआई का एक ईकोसिस्टम विकसित कर रहे हैं। इसमें हम 80% कामयाब हो भी चुके हैं। बच्चों के एकेडमिक प्रोसीजर्स, बच्चे का असिस्मेंट, एग्जामिनेशन को हम एआई की मदद से मॉनिटर कर रहे हैं। इसकी मदद से हमें पता चलता है कि कौन बच्चा स्लो लर्नर और कौन फास्ट लर्नर या किसकी उपस्थिति कमजोर है।
कैंपस में लगे एआई इनेबल्ड कैमरा बताते हैं कि कौन सा बच्चा स्ट्रेस में है और किसके लिए इस समय काउंसलिंग मैंटोरशिप जरूरी है। हम प्लेसमेंट्स में भी इसका इस्तेमाल करते हैं।
आईआईएम लखनऊ के निदेशक प्रो. मनमोहन प्रसाद गुप्ता क्या बोले
एआई के विषय पर अपने विचार रखते हुए आईआईएम लखनऊ के निदेशक प्रो. मनमोहन प्रसाद गुप्ता ने कहा कि भविष्य की पीढ़ियों के सामने नई तरह की चुनौतियां तेजी से उभर रही हैं, क्योंकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब लगभग हर क्षेत्र में अपनी भूमिका निभाने जा रहा है। उन्होंने कहा कि अब चर्चा इस बात की नहीं रह गई है कि एआई का विस्तार होगा या नहीं, बल्कि असली जरूरत यह समझने की है कि भारत इस क्षेत्र में अपनी दक्षता और कौशल को किस तरह मजबूत बनाएगा।
तकनीक, इनोवेशन और भविष्य की तैयारी पर जोर
प्रो. गुप्ता ने कहा कि वर्तमान समय में भारत मुख्य रूप से तकनीक का उपयोग करने वाले देशों की श्रेणी में खड़ा दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि यह समझना भी जरूरी है कि सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) से जुड़े उपकरण जैसे कंप्यूटर, मोबाइल, चिप और अन्य डिजिटल डिवाइस आखिर कहां तैयार हो रहे हैं। साथ ही इन तकनीकों के पीछे मौजूद रिसर्च, इनोवेशन और पेटेंट किसके नियंत्रण में हैं, इस पर भी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि इस पूरे तकनीकी ढांचे को समझने के लिए तीन प्रमुख सवालों पर ध्यान देना जरूरी है। पहला, तकनीक और डिजिटल उपकरणों का निर्माण कौन कर रहा है? दूसरा, चिप और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस किस देश या क्षेत्र में तैयार हो रहे हैं? और तीसरा, इन तकनीकों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल कौन कर रहा है? उनके अनुसार इन तीनों पहलुओं में भारत फिलहाल अधिकतर “यूजर साइड” यानी उपयोगकर्ता की भूमिका में दिखाई देता है।