वह बताते हैं, 'मैं एक गरीब चरवाहा था। उस दौर में मैंने वो याक 12 हजार रुपये में खरीदा था। ऐसे में जब पहाड़ों में मेरा याक खो गया तो मैं परेशान हो गया। सामान्य तौर पर याक शाम तक वापिस आ जाते हैं। लेकिन ये एक नया याक था, जिसकी वजह से मुझे उसकी तलाश में जाना पड़ा। उस दिन मुझे याक तो मिल गया, लेकिन उसके साथ मैंने पाकिस्तानी सैनिकों को भी देखा।'
ताशी कारगिल से साठ किलोमीटर की दूरी पर सिंधु नदी के किनारे गारकौन नामक गांव में रहते हैं। उनसे बात करने उनके गांव गए बीबीसी पत्रकार अरविंद छाबड़ा बताते हैं, 'ताशी मुझे उस जगह लेकर भी गए जहां उन्होंने घुसपैठियों को देखा था। बौद्ध धर्म को मानने वाले ताशी ने बड़े गर्व के साथ रास्ते में मुझे अपना वो खेत भी दिखाया जहां पर वो खुबानी उगाते हैं। चलते-चलते जब हम सही जगह पहुंच गए तो उन्होंने चिल्लाकर कहा, वो यहीं पर थे और ये वो जगह है जहां पर चढ़कर मैंने उन्हें देखा था।'
ताशी बताते हैं, 'जब मुझे कुछ संदिग्ध लोग दिखे, तो पहले मेरे मन में विचार आया कि शायद ये लोग शिकारी थे। इसके बाद मैंने दौड़कर सेना को इस बारे में जानकारी दी।' ये सूचना मिलने के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच कारगिल में युद्ध लड़ा गया, जिसमें करीब 600 भारतीय सैनिक शहीद हुए।
ताशी और इस गांव के दूसरे लोग गर्व के साथ बताते हैं कि उन्होंने अपने स्तर पर इस युद्ध में भारत को हासिल हुई जीत में अपनी भूमिका निभाई है। युद्ध के बाद ताशी को मिले सम्मान चिह्न भी दिया गया था। ज्यादातर अवॉर्ड उनकी सजगता और बहादुरी के लिए उन्हें दिए गए।
लेकिन कारगिल युद्ध के 20 साल बाद उनका सम्मान चिह्नों से मन भर गया है। वह कहते हैं, "मेरे चार बच्चे हैं। लेकिन मेरी एक बच्ची की पढ़ाई में मदद के अलावा मुझे कोई आर्थिक मदद नहीं मिली। कई वादे किए गए थे लेकिन उनमें से कोई भी पूरा नहीं किया गया।'
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