उन्नीसवीं सदी की परंपरा के अनुसार नाइटिंगेल का परिवार वर्ष 1837 में यूरोफ की यात्रा करने निकल गया। उस समय यह दौरा बच्चों की शिक्षा के लिए बेहद जरूरी माना जाता था। फ्लोरेंस को अंकों के साथ खेलना बहुत शौक था। इसलिए वे पूरे सफर के दौरान हर देश और शहर की आबादी, अस्पताल और दान-कल्याण की संस्थानों की संख्या को अपनी डायरी में लिखा करती थीं।
गणित में नाइटिंगेल की रूचि को मद्देनजर देखते हुए, उन्हें गणित की बेहतर तालीम के लिए ट्यूशन भेज दिया गया। फ्लोरेंस की मां इसके सख्त खिलाफ थीं। यूरोप के सफर के दौरान उन्होंने एक अजीब बात कही, जिसकी वजह से उनके मां-बाप बेहद परेशान हो गए। उन्होंने कहा, ईश्वर ने मुझे मानवता की सेवा का आदेश दिया है। किंतु उन्होंने मुझे इस बात की जानकारी नहीं दी कि मैं मानवता की सेवा कैसे कर सकती हूं।
लोगों की सेवा करने के लिए 1844 में फ्लोरेंस ने नर्स बनने की ठानी। उन्होंने सैलिसबरी में जाकर नर्सिंग की ट्रेनिंग लेने की जिद की। लेकिन उनके मां-बाप ने उन्हें इस बात की इजाजत नहीं दी। मां-बाप के खिलाफ जाकर फ्लोरेंस रोम, लंदन और पेरिस के अस्पतालों का दौरा किया करती थी। तमाम कोशिशों के बाद भी 1850 तक नाइटिंगेल शादी के लिए नहीं मानी। उनका कहना था कि ईश्वर ने उन्हें किसी और काम के लिए चुना है।
सालों की मेहनत के बाद 1853 में फ्लोरेंस को लंदन के हार्ले स्ट्रीट अस्पताल में नर्सिंग की प्रमुख बनने का अवसर मिला। इसी वर्ष क्रीमिया का युद्ध भी शुरू हो गया था। ब्रिटिश सैनिक अस्पतालों की दुर्दशा की खबरें सामने आने लगीं। ब्रिटेन के तत्कालीन युद्ध मंत्री सिडनी हर्बर्ट, नाइटिंगेल को जानते थे। इसलिए उन्होंने नाइटिंगेल को 38 नर्सों के साथ तुर्की के स्कुतरी स्थित मिलिट्री अस्पताल जाने को कहा।
ब्रिटेन में पहली बार महिलाओं को सेना में शामिल किया गया था। मिलिट्री अस्पताल पहुंचते ही फ्लोरेंस ने अपनी साथी नर्स को काम पर लगा दिया। उन्होंने सैनिकों के खान-पान और कपड़ों का इंतजाम किया। ब्रिटेन के इतिहास में यह पहला मौका था जब सैनिकों को इतने सम्मान के साथ रखा जा रहा था। फ्लोरेंस की तमाम कोशिशों के बाद भी सैनिकों की मौत का आंकड़ा बढ़ते जा रहा था।
1855 की बसंत ऋतु में ब्रिटिश सरकार ने अस्पताल का जायजा लेने के लिए एक सैनिटरी कमीशन बनाकर भेजा। जांच में पाया गया कि बराक अस्पताल का निर्माण सीवर के ऊपर किया गया था। जिसकी वजह से सैनिकों के पास पीने के लिए गंदा पानी आ रहा था। नतीजतन सभी अस्पतालों की सफाई करवाई गई और मौतों का आंकड़ा कम होने लगा। इस दौरान अखबारों में फ्लोरेंस हाथ में मशाल लिए तस्वीर छपने के बाद उसके हजारों फैन बन गए। इस तस्वीर की वजह से वह ‘द लेडी विद द लैम्प’ के नाम से मशहूर हो गई।
फ्लोरेंस एक सेलिब्रिटी बन गई थी, किंतु वे यह कभी भी नहीं चाहती थी। इसलिए क्रीमिया के युद्ध के बाद वे मिस स्मिथ के फर्जी नाम से रहने लगीं। उन्होंने महारानी विक्टोरिया से सेना की सेहत की पड़ताल करने का आग्रह किया। फ्लोरेंस की सलाह पर महारानी ने विलियम फार और जॉन सदरलैंड को उनकी मदद के लिए भेजा। 1857 में जब रॉयल कमीशन की रिपोर्ट तैयार हुई, तो फ्लोरेंस को इस बात का एहसास हुआ कि केवल आंकड़ों से लोग सैनिकों की हालातों के बारे में नहीं समझेंगे। इसलिए उन्होंने रोज डायग्राम के जरिए लोगों को समझाया। अखबारों ने भी इस प्रकाशित कर फ्लोरेंस का संदेश दूर-दूर तक पहुंचाया। फ्लोरेंस की इस कोशिश की वजह से ब्रिटिश फौज में मेडिकल, सैनिटरी साइंस यानी साफ-सफाई के विज्ञान और सांख्यिकी के विभाग बनाए गए।
1859 में फ्लोरेंस ने अपनी किताब नोट्स ऑन नर्सिंग एंड नोट्स ऑन हॉस्पिटल्स प्रकाशित की। 1860 में ब्रिटिश सरकार ने फ्लोरेंस के नाम पर एक नर्सिंग विद्यालय की स्थापना की। फ्लोरेंस के काम की वजह से, नर्सों के पेशे और अस्पतालों के रंग-रूप में बदलाव आने लगे। सब लोग नर्सों को सम्मान की नजर से देखने लगे।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार क्रीमिया में फ्लोरेंस को ब्रुसेलोसिस के कीटाणुओं का हमला झेलना पड़ा था। इस वजह से उन्हें तेज बुखार, डिप्रेशन और बदन दर्द होने लगा। वे कमजोर होती गई। लेकिन उनका संकल्प अभी भी दृढ़ था। वे आंकड़ों की मदद से स्वास्थ्य सेवा में सुधार की जंग लड़ती रही। उन्होंने अपनी किताब नोट्स ऑन नर्सिंग से लोगों को समझाया कि वो कैसे बीमारी में एक-दूसरे की मदद कर सकते हैं। ताकि अमीर हो या गरीब, हर कोई बीमारी से जल्द ठीक हो जाए।
फ्लोरेंस के मिशन की वजह से ब्रिटेन ने नेशनल हेल्थ सर्विस की दिशा में काम करना शुरू किया। फ्लोरेंस नाइटिंगेल भारत में भी ब्रिटिश सैनिकों की सेहत को बेहतर करने की मुहिम से जुड़ी हुई थी। इस दौरान उन्होंने भारत में साफ पानी की सप्लाई पर जोर दिया। उस वक्त भारत में अकाल के हालात ठीक तुर्की के स्कुतारी के जैसे थे। फ्लोरेंस को भारत के हालात के बारे में 1906 तक रिपोर्ट भेजी जाती रही और वे भारत के हालातों में सुधार करती रही। भारत भी फ्लोरेंस नाइटिंगेल का कर्जदार है। 1910 में फ्लोरेंस नाइटिंगेल का 90 साल की उम्र में निधन हो गया।