सिर्फ छह विमानों से शुरू हुई थी भारतीय वायुसेना, आज आसमान की कितनी बड़ी ताकत? जानें पूरा सफर
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
Published by: शिवम तिवारी
Updated Thu, 08 Oct 2026 06:14 AM IST
सार
भारतीय वायुसेना की शुरुआत 8 अक्टूबर 1932 को सिर्फ 6 अधिकारियों, 19 वायुसैनिकों और 4 विमानों के छोटे बेड़े से हुई थी। करीब 94 वर्षों में यह लड़ाकू, परिवहन, हेलीकॉप्टर और विशेष मिशन वाले विमानों से लैस बड़ी वायु शक्ति बन चुकी है। सुखोई, राफेल और तेजस इसकी ताकत बढ़ाते हैं, जबकि एएमसीए जैसे प्रोजेक्ट भविष्य की स्वदेशी हवाई क्षमता को मजबूत कर रहे हैं।
Indian Air Force Day
- फोटो : AI Generated
आज आसमान में तेज रफ्तार लड़ाकू विमान गरजते हैं, दुश्मन की सीमा तक सटीक हमला करने वाली मिसाइलें हैं और हजारों किलोमीटर दूर तक सैनिकों और भारी सामान को पहुंचाने वाले विशाल परिवहन विमान भी हैं। लेकिन भारतीय वायुसेना का यह सफर इतना बड़ा हमेशा से नहीं था। आज से करीब 94 साल पहले जब इसकी शुरुआत हुई, तब इसके पास सीमित संख्या में प्रशिक्षित पायलट, वायुसैनिक और कुछ छोटे विमान ही थे। 8 अक्टूबर 1932 को शुरू हुई इस वायुसेना ने धीरे-धीरे युद्धों, तकनीकी बदलाव और आधुनिकीकरण के बीच अपनी पहचान बनाई। आज इसके बेड़े में लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, परिवहन विमान और विशेष मिशन वाले विमान शामिल हैं। आइए जानते हैं छोटे से बेड़े से दुनिया की प्रमुख वायु शक्तियों में शामिल होने तक का पूरा सफर।
शुरुआत में कितनी छोटी थी वायुसेना?
भारतीय वायुसेना की आधिकारिक स्थापना 8 अक्टूबर 1932 को ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी। उस समय इसका स्वरूप आज की विशाल वायुसेना जैसा बिल्कुल नहीं था। शुरुआत में इसमें 6 आरएएफ प्रशिक्षित भारतीय अधिकारियों और 19 हवाई सिपाहियों का छोटा दल था। यानी कुल बल बेहद सीमित था। इसके शुरुआती काम में मुख्य रूप से टोह लेना और निगरानी जैसे अभियान शामिल थे। वायुसेना की पहली परिचालन उड़ान 1 अप्रैल 1933 को हुई। उस समय इसके पास चार वेस्टलैंड वापिति IIA विमान थे। ये दो सीट वाले साधारण बाइप्लेन थे। इस तरह आज की आधुनिक वायुसेना की नींव बेहद छोटे बेड़े और सीमित संसाधनों के साथ रखी गई थी।
रॉयल इंडियन एयरफोर्स नाम कब मिला?
शुरुआती दौर में भारतीय वायुसेना ब्रिटिश भारतीय सैन्य व्यवस्था का हिस्सा थी। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और उसके प्रदर्शन के बाद वर्ष 1945 में इसे रॉयल इंडियन एयरफोर्स यानी RIAF नाम दिया गया। आजादी के बाद भी कुछ समय तक यह नाम इस्तेमाल होता रहा। लेकिन भारत के गणराज्य बनने के साथ इसमें बड़ा बदलाव आया। 26 जनवरी 1950 को भारत गणराज्य बना और इसी के साथ वायुसेना के नाम से ‘रॉयल’ शब्द हटा दिया गया। इसके बाद इसे आधिकारिक रूप से भारतीय वायुसेना यानी Indian Air Force कहा जाने लगा। नाम भले बदला, लेकिन देश की हवाई सुरक्षा में इसकी जिम्मेदारी लगातार बढ़ती गई।
किन युद्धों में वायुसेना ने दिखाई ताकत?
आज भारतीय वायुसेना जिस रूप में दिखाई देती है, उसके पीछे कई दशकों का अनुभव है। 1947-48, 1965 और 1971 के युद्धों के साथ-साथ कारगिल युद्ध के दौरान भी वायुसेना ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन अभियानों ने लड़ाकू विमानों, हवाई निगरानी, परिवहन और सैनिकों को तेजी से पहुंचाने की क्षमता को मजबूत किया। समय के साथ वायुसेना ने पुराने विमानों की जगह आधुनिक लड़ाकू विमानों को शामिल किया और अपनी रणनीतिक क्षमता बढ़ाई। कारगिल युद्ध में ऊंचाई वाले इलाकों में अभियान चलाना भी एक बड़ी चुनौती थी। इसके बाद भारतीय वायुसेना ने निगरानी, सटीक हमले और आधुनिक तकनीक पर और अधिक ध्यान दिया। आज उसका काम केवल हवाई लड़ाई तक सीमित नहीं है।
आज कितना बड़ा है विमानों का बेड़ा?
आज भारतीय वायुसेना के पास अलग-अलग भूमिकाओं वाले 1,700 से अधिक विमान हैं। WDMMA के 2026 आंकड़ों के अनुसार भारतीय वायुसेना के सक्रिय बेड़े में 1,716 विमान शामिल हैं। इनमें लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, परिवहन विमान, प्रशिक्षण विमान और विशेष मिशन वाले विमान शामिल हैं। WDMMA की सूची में 542 लड़ाकू श्रेणी के विमान, 498 हेलीकॉप्टर, 282 परिवहन विमान, 374 प्रशिक्षण विमान और 14 विशेष मिशन वाले विमान शामिल हैं। इसके अलावा भविष्य के लिए 349 विमान और हेलीकॉप्टर खरीद या शामिल किए जाने की सूची में हैं। भारतीय वायुसेना में 1.4 लाख से अधिक सक्रिय सैन्यकर्मी भी सेवा दे रहे हैं।
सुखोई और राफेल कितने खास हैं?
भारतीय वायुसेना की लड़ाकू क्षमता में सुखोई-30 एमकेआई की महत्वपूर्ण भूमिका है। यह भारतीय बेड़े का प्रमुख बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमान है और इसकी बड़ी संख्या वायुसेना की ताकत का अहम हिस्सा है। इसके अलावा फ्रांस से मिले राफेल लड़ाकू विमानों ने लंबी दूरी के सटीक हमले और बहुउद्देश्यीय अभियानों की क्षमता को मजबूत किया है। वायुसेना के पास मिराज-2000 और मिग-29 जैसे विमान भी हैं, जिन्होंने अलग-अलग अभियानों में अपनी उपयोगिता साबित की है। सुखोई जैसे विमानों को आधुनिक हथियारों और लंबी दूरी की मिसाइलों से लैस करने की दिशा में भी काम जारी है। इस विविध बेड़े की वजह से वायुसेना अलग-अलग परिस्थितियों में कई तरह के अभियान चला सकती है।
तेजस से कितनी बढ़ रही आत्मनिर्भरता?
भारतीय वायुसेना के आधुनिकीकरण में स्वदेशी एलसीए तेजस बेहद महत्वपूर्ण विमान है। इसे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल ने विकसित किया है। तेजस के जरिए भारत लड़ाकू विमानों के क्षेत्र में अपनी घरेलू क्षमता को मजबूत कर रहा है। वायुसेना ने उन्नत तेजस एमके-1ए को भी अपने बेड़े में शामिल करने के लिए बड़े ऑर्डर दिए हैं। WDMMA के आंकड़ों में तेजस के साथ कई स्वदेशी प्लेटफॉर्म भविष्य की खरीद सूची में भी शामिल हैं। इसके साथ ही भारत एएमसीए यानी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट पर काम कर रहा है। इसका लक्ष्य भविष्य के लिए स्वदेशी स्टेल्थ लड़ाकू विमान विकसित करना है।
परिवहन और हेलीकॉप्टर कितने जरूरी हैं?
वायुसेना की ताकत सिर्फ लड़ाकू विमानों से तय नहीं होती। युद्ध, प्राकृतिक आपदा या बड़े सैन्य अभियान के दौरान सैनिकों, हथियारों और भारी सामान को तेजी से पहुंचाना भी जरूरी होता है। इसके लिए भारतीय वायुसेना के पास सी-17 ग्लोबमास्टर III, सी-130जे सुपर हरक्युलिस और सी-295 जैसे परिवहन विमान हैं। वहीं हेलीकॉप्टरों में अपाचे और स्वदेशी प्रचंड जैसे आक्रामक हेलीकॉप्टर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके जरिए कठिन इलाकों में सैनिकों और सामान की आवाजाही के साथ जमीनी लक्ष्यों के खिलाफ अभियान चलाए जा सकते हैं। इस तरह वायुसेना लड़ाकू विमानों के साथ एक बड़ा लॉजिस्टिक्स नेटवर्क भी संभालती है।
आज दुनिया में किस पायदान पर है भारतीय वायुसेना?
भारतीय वायुसेना का सफर चार छोटे विमानों से शुरू होकर आज एक बड़े और विविध सैन्य बेड़े तक पहुंच चुका है। WDMMA की 2026 Global Air Powers Ranking में भारतीय वायुसेना को छठे स्थान पर रखा गया है और उसका TruVal Rating 69.4 है। इसी रैंकिंग में चीन की वायुसेना सातवें स्थान पर है। यह रैंकिंग केवल विमानों की संख्या के आधार पर नहीं होती, बल्कि आधुनिकीकरण, लॉजिस्टिक्स, विशेष मिशन, प्रशिक्षण, लड़ाकू क्षमता और भविष्य की खरीद जैसे कई पहलुओं को ध्यान में रखती है। भारत अब बड़े बहुराष्ट्रीय अभ्यासों की मेजबानी भी करता है। ‘तरंग शक्ति’ जैसे अभ्यास भारतीय वायुसेना की बढ़ती परिचालन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग क्षमता को दिखाते हैं। चार विमानों से शुरू हुआ यह सफर आज तकनीक, अनुभव और आत्मनिर्भरता की दिशा में लगातार आगे बढ़ रहा है।
Indian Air Force Day
- फोटो : AI Generated
आज आसमान में तेज रफ्तार लड़ाकू विमान गरजते हैं, दुश्मन की सीमा तक सटीक हमला करने वाली मिसाइलें हैं और हजारों किलोमीटर दूर तक सैनिकों और भारी सामान को पहुंचाने वाले विशाल परिवहन विमान भी हैं। लेकिन भारतीय वायुसेना का यह सफर इतना बड़ा हमेशा से नहीं था। आज से करीब 94 साल पहले जब इसकी शुरुआत हुई, तब इसके पास सीमित संख्या में प्रशिक्षित पायलट, वायुसैनिक और कुछ छोटे विमान ही थे। 8 अक्टूबर 1932 को शुरू हुई इस वायुसेना ने धीरे-धीरे युद्धों, तकनीकी बदलाव और आधुनिकीकरण के बीच अपनी पहचान बनाई। आज इसके बेड़े में लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, परिवहन विमान और विशेष मिशन वाले विमान शामिल हैं। आइए जानते हैं छोटे से बेड़े से दुनिया की प्रमुख वायु शक्तियों में शामिल होने तक का पूरा सफर।
शुरुआत में कितनी छोटी थी वायुसेना?
भारतीय वायुसेना की आधिकारिक स्थापना 8 अक्टूबर 1932 को ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी। उस समय इसका स्वरूप आज की विशाल वायुसेना जैसा बिल्कुल नहीं था। शुरुआत में इसमें 6 आरएएफ प्रशिक्षित भारतीय अधिकारियों और 19 हवाई सिपाहियों का छोटा दल था। यानी कुल बल बेहद सीमित था। इसके शुरुआती काम में मुख्य रूप से टोह लेना और निगरानी जैसे अभियान शामिल थे। वायुसेना की पहली परिचालन उड़ान 1 अप्रैल 1933 को हुई। उस समय इसके पास चार वेस्टलैंड वापिति IIA विमान थे। ये दो सीट वाले साधारण बाइप्लेन थे। इस तरह आज की आधुनिक वायुसेना की नींव बेहद छोटे बेड़े और सीमित संसाधनों के साथ रखी गई थी।
रॉयल इंडियन एयरफोर्स नाम कब मिला?
शुरुआती दौर में भारतीय वायुसेना ब्रिटिश भारतीय सैन्य व्यवस्था का हिस्सा थी। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और उसके प्रदर्शन के बाद वर्ष 1945 में इसे रॉयल इंडियन एयरफोर्स यानी RIAF नाम दिया गया। आजादी के बाद भी कुछ समय तक यह नाम इस्तेमाल होता रहा। लेकिन भारत के गणराज्य बनने के साथ इसमें बड़ा बदलाव आया। 26 जनवरी 1950 को भारत गणराज्य बना और इसी के साथ वायुसेना के नाम से ‘रॉयल’ शब्द हटा दिया गया। इसके बाद इसे आधिकारिक रूप से भारतीय वायुसेना यानी Indian Air Force कहा जाने लगा। नाम भले बदला, लेकिन देश की हवाई सुरक्षा में इसकी जिम्मेदारी लगातार बढ़ती गई।
किन युद्धों में वायुसेना ने दिखाई ताकत?
आज भारतीय वायुसेना जिस रूप में दिखाई देती है, उसके पीछे कई दशकों का अनुभव है। 1947-48, 1965 और 1971 के युद्धों के साथ-साथ कारगिल युद्ध के दौरान भी वायुसेना ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन अभियानों ने लड़ाकू विमानों, हवाई निगरानी, परिवहन और सैनिकों को तेजी से पहुंचाने की क्षमता को मजबूत किया। समय के साथ वायुसेना ने पुराने विमानों की जगह आधुनिक लड़ाकू विमानों को शामिल किया और अपनी रणनीतिक क्षमता बढ़ाई। कारगिल युद्ध में ऊंचाई वाले इलाकों में अभियान चलाना भी एक बड़ी चुनौती थी। इसके बाद भारतीय वायुसेना ने निगरानी, सटीक हमले और आधुनिक तकनीक पर और अधिक ध्यान दिया। आज उसका काम केवल हवाई लड़ाई तक सीमित नहीं है।
आज कितना बड़ा है विमानों का बेड़ा?
आज भारतीय वायुसेना के पास अलग-अलग भूमिकाओं वाले 1,700 से अधिक विमान हैं। WDMMA के 2026 आंकड़ों के अनुसार भारतीय वायुसेना के सक्रिय बेड़े में 1,716 विमान शामिल हैं। इनमें लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, परिवहन विमान, प्रशिक्षण विमान और विशेष मिशन वाले विमान शामिल हैं। WDMMA की सूची में 542 लड़ाकू श्रेणी के विमान, 498 हेलीकॉप्टर, 282 परिवहन विमान, 374 प्रशिक्षण विमान और 14 विशेष मिशन वाले विमान शामिल हैं। इसके अलावा भविष्य के लिए 349 विमान और हेलीकॉप्टर खरीद या शामिल किए जाने की सूची में हैं। भारतीय वायुसेना में 1.4 लाख से अधिक सक्रिय सैन्यकर्मी भी सेवा दे रहे हैं।
सुखोई और राफेल कितने खास हैं?
भारतीय वायुसेना की लड़ाकू क्षमता में सुखोई-30 एमकेआई की महत्वपूर्ण भूमिका है। यह भारतीय बेड़े का प्रमुख बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमान है और इसकी बड़ी संख्या वायुसेना की ताकत का अहम हिस्सा है। इसके अलावा फ्रांस से मिले राफेल लड़ाकू विमानों ने लंबी दूरी के सटीक हमले और बहुउद्देश्यीय अभियानों की क्षमता को मजबूत किया है। वायुसेना के पास मिराज-2000 और मिग-29 जैसे विमान भी हैं, जिन्होंने अलग-अलग अभियानों में अपनी उपयोगिता साबित की है। सुखोई जैसे विमानों को आधुनिक हथियारों और लंबी दूरी की मिसाइलों से लैस करने की दिशा में भी काम जारी है। इस विविध बेड़े की वजह से वायुसेना अलग-अलग परिस्थितियों में कई तरह के अभियान चला सकती है।
तेजस से कितनी बढ़ रही आत्मनिर्भरता?
भारतीय वायुसेना के आधुनिकीकरण में स्वदेशी एलसीए तेजस बेहद महत्वपूर्ण विमान है। इसे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानी एचएएल ने विकसित किया है। तेजस के जरिए भारत लड़ाकू विमानों के क्षेत्र में अपनी घरेलू क्षमता को मजबूत कर रहा है। वायुसेना ने उन्नत तेजस एमके-1ए को भी अपने बेड़े में शामिल करने के लिए बड़े ऑर्डर दिए हैं। WDMMA के आंकड़ों में तेजस के साथ कई स्वदेशी प्लेटफॉर्म भविष्य की खरीद सूची में भी शामिल हैं। इसके साथ ही भारत एएमसीए यानी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट पर काम कर रहा है। इसका लक्ष्य भविष्य के लिए स्वदेशी स्टेल्थ लड़ाकू विमान विकसित करना है।
परिवहन और हेलीकॉप्टर कितने जरूरी हैं?
वायुसेना की ताकत सिर्फ लड़ाकू विमानों से तय नहीं होती। युद्ध, प्राकृतिक आपदा या बड़े सैन्य अभियान के दौरान सैनिकों, हथियारों और भारी सामान को तेजी से पहुंचाना भी जरूरी होता है। इसके लिए भारतीय वायुसेना के पास सी-17 ग्लोबमास्टर III, सी-130जे सुपर हरक्युलिस और सी-295 जैसे परिवहन विमान हैं। वहीं हेलीकॉप्टरों में अपाचे और स्वदेशी प्रचंड जैसे आक्रामक हेलीकॉप्टर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके जरिए कठिन इलाकों में सैनिकों और सामान की आवाजाही के साथ जमीनी लक्ष्यों के खिलाफ अभियान चलाए जा सकते हैं। इस तरह वायुसेना लड़ाकू विमानों के साथ एक बड़ा लॉजिस्टिक्स नेटवर्क भी संभालती है।
आज दुनिया में किस पायदान पर है भारतीय वायुसेना?
भारतीय वायुसेना का सफर चार छोटे विमानों से शुरू होकर आज एक बड़े और विविध सैन्य बेड़े तक पहुंच चुका है। WDMMA की 2026 Global Air Powers Ranking में भारतीय वायुसेना को छठे स्थान पर रखा गया है और उसका TruVal Rating 69.4 है। इसी रैंकिंग में चीन की वायुसेना सातवें स्थान पर है। यह रैंकिंग केवल विमानों की संख्या के आधार पर नहीं होती, बल्कि आधुनिकीकरण, लॉजिस्टिक्स, विशेष मिशन, प्रशिक्षण, लड़ाकू क्षमता और भविष्य की खरीद जैसे कई पहलुओं को ध्यान में रखती है। भारत अब बड़े बहुराष्ट्रीय अभ्यासों की मेजबानी भी करता है। ‘तरंग शक्ति’ जैसे अभ्यास भारतीय वायुसेना की बढ़ती परिचालन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग क्षमता को दिखाते हैं। चार विमानों से शुरू हुआ यह सफर आज तकनीक, अनुभव और आत्मनिर्भरता की दिशा में लगातार आगे बढ़ रहा है।