फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Engineer's Day: पढ़ें विश्वेश्वरैया के जीवन का ये मशहूर किस्सा, बचाई थी सैकड़ों लोगों की जान

Sun, 15 Sep 2019 02:21 PM IST
Garima Garg एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
विज्ञापन
engineers day - फोटो : amar ujala
विज्ञापन
भारत रत्न से सम्मानित सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की आज 159वीं जयंती है। उन्हीं की याद में भारत में हर साल 15 सितंबर को इंजीनियर्स डे (अभियंता दिवस) मनाया जाता है। विश्वेश्वरैया शिक्षा की महत्ता को भलीभांति समझते थे। लोगों की गरीबी व कठिनाइयों का मुख्य कारण वह अशिक्षा को मानते थे। वह किसी भी कार्य को योजनाबद्ध तरीके से पूरा करने में विश्वास करते थे।
विज्ञापन


यही कारण है कि उन्हें देश के एक महान इंजीनियर के तौर पर जाना जाता है। विश्वेश्वरैया का जन्म मैसूर (कर्नाटक) के कोलार जिले के चिक्काबल्लापुर तालुक में 15 सितंबर, 1861 को एक तेलुगु परिवार में हुआ था। वह 100 वर्षों से अधिक जीवित रहे थे और अंत तक सक्रिय जीवन ही व्यतीत किया था। आइए पढ़ते हैं उनके जीवन से जुड़ा एक मजेदार किस्सा...

ये भी पढ़ें- Engineer's Day: कितना पुराना है भारत का पहला इंजीनियरिंग कॉलेज, कैसे हुई थी इसकी शुरुआ
विज्ञापन
विज्ञापन

उनसे जुड़ा एक किस्सा काफी मशहूर है कि एक बार एक व्यक्ति ने उनसे पूछा, 'आपके चिर यौवन (दीर्घायु) का रहस्य क्या है?' तब डॉ. विश्वेश्वरैया ने उत्तर दिया, 'जब बुढ़ापा मेरा दरवाज़ा खटखटाता है तो मैं भीतर से जवाब देता हूं कि विश्वेश्वरैया घर पर नहीं है और वह निराश होकर लौट जाता है। बुढ़ापे से मेरी मुलाकात ही नहीं हो पाती तो वह मुझ पर हावी कैसे हो सकता है?' 

अंग्रेजों को लेकर भी उनसे जुड़ा एक किस्सा काफी प्रसिद्ध है। दरअसल, यह उस समय की बात है जब भारत में अंग्रेजों का शासन था। खचाखच भरी एक रेलगाड़ी चली जा रही थी। यात्रियों में अधिकतर अंग्रेज थे। एक डिब्बे में एक भारतीय मुसाफिर गंभीर मुद्रा में बैठा था। सांवले रंग और मंझले कद का वह यात्री साधारण वेशभूषा में था इसलिए वहां बैठे अंग्रेज उसे मूर्ख और अनपढ़ समझ रहे थे और उसका मजाक उड़ा रहे थे। पर वह व्यक्ति किसी की बात पर ध्यान नहीं दे रहा था। 

अचानक उस व्यक्ति ने उठकर ट्रेन की जंजीर खींच दी। तेज रफ्तार में दौड़ती ट्रेन तत्काल रुक गई। सभी यात्री उसे भला-बुरा कहने लगे। थोड़ी देर में गार्ड भी आ गया और उसने पूछा, 'जंजीर किसने खींची है?' उस व्यक्ति ने बेझिझक उत्तर दिया, 'मैंने खींची है।' कारण पूछने पर उसने बताया, 'मेरा अनुमान है कि यहां से लगभग एक फर्लांग (220 गज) की दूरी पर रेल की पटरी उखड़ी हुई है।' 

गार्ड ने पूछा, 'आपको कैसे पता चला?' वह बोला, 'श्रीमान! मैंने अनुभव किया कि गाड़ी की स्वाभाविक गति में अंतर आ गया है। पटरी से गूंजने वाली आवाज की गति से मुझे खतरे का आभास हो रहा है।' गार्ड उस व्यक्ति को साथ लेकर जब कुछ दूरी पर पहुंचा तो यह देखकर दंग रह गया कि वास्तव में एक जगह से रेल की पटरी के जोड़ खुले हुए हैं और सब नट-बोल्ट अलग बिखरे पड़े हैं। तब तक दूसरे यात्री भी वहां आ पहुंचे। 

जब लोगों को पता चला कि उस व्यक्ति की सूझबूझ के कारण उनकी जान बच गई है तो वे उसकी प्रशंसा करने लगे। गार्ड ने पूछा, 'आप कौन हैं?' उस व्यक्ति ने कहा, 'मैं एक इंजीनियर हूं और मेरा नाम है डॉ. एम. विश्वेश्वरैया है।' यह नाम सुन ट्रेन में बैठे सारे अंग्रेज स्तब्ध रह गए। 

दरअसल उस समय तक देश में डॉ. विश्वेश्वरैया की ख्याति फैल चुकी थी। ट्रेन में बैठे सारे लोग उनसे माफी मांगने लगे। तब डॉ. विश्वेश्वरैया ने उत्तर दिया, 'आप सब ने मुझे जो कुछ भी कहा होगा, मुझे तो बिल्कुल याद नहीं है।' 

ये भी पढ़ें- Engineer's Day: 15 सितंबर को ही क्यों मनाते हैं ये दिन, छिपी है दिलचस्प कहानी
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें