-नदी में बढ़ते प्रदूषण और अतिक्रमण पर हाईकोर्ट सख्त, पीठ ने कहा, स्थिति हो गई बेहद गंभीर
संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने झांसी से होकर बहने वाली पाहुज नदी में बढ़ते प्रदूषण और अतिक्रमण पर कड़ा रुख अपनाते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को तत्काल व्यक्तिगत हस्तक्षेप करने का आदेश दिया है। एनजीटी अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेष सदस्य डॉ. ए सेंथिल वेल की पीठ ने कहा, नदी की स्थिति बेहद गंभीर हो गई है। यह बुंदेलखंड क्षेत्र की जल सुरक्षा के लिए खतरा बनती जा रही है। पाहुज नदी सिंध और आगे चलकर यमुना की सहायक नदी है, जिसके कारण इसका प्रदूषण बड़े क्षेत्र को प्रभावित कर सकता है।
सुनवाई के दौरान संयुक्त समिति की रिपोर्ट पर जांच कर अदालत ने कहा, 27 नवंबर, 2025 को दाखिल तस्वीरों में नदी पूरी तरह कचरे, सीवेज और जलकुंभी से भरी दिखाई दी। अधिकरण ने नगर निगम झांसी, सिंचाई विभाग और झांसी विकास प्राधिकरण की आलोचना करते हुए कहा, सभी विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर समय गंवा रहे हैं। झांसी विकास प्राधिकरण तो नोटिस के बावजूद कोर्ट में उपस्थित भी नहीं हुआ। सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने एनजीटी को बताया कि झांसी नगर निगम पर 16.10 करोड़ रुपये का पर्यावरण मुआवजा लगाया गया था, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 4 अगस्त 2025 को दिए आदेश के बाद केंद्र सरकार ने आवश्यक उप-विधियां अभी तक नहीं बनाई हैं। इसकी वजह से जुर्माना वसूली में देरी हो रही है। इस पर अदालत ने पर्यावरण मंत्रालय को छह सप्ताह में शपथ-पत्र दाखिल करने का निर्देश दिया।
अधिकरण ने अपने आदेश में कहा कि उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप करते हुए छह सप्ताह के भीतर विस्तृत कार्रवाई रिपोर्ट पेश करें। अधिकरण ने निर्देश दिया कि पाहुज नदी में बह रहा अनुपचारित सीवेज तुरंत रोका जाए और स्टॉर्म वॉटर ड्रेनों में मिल रहे गंदे पानी को भी टैप किया जाए। साथ ही, नदी में कचरा और मलबा फेंकने पर पूरी तरह रोक लगाई जाए। अदालत ने यह भी कहा कि नदी के फ्लडप्लेन क्षेत्र को चिह्नित कर सभी अतिक्रमण हटाए जाएं और नदी का प्राकृतिक प्रवाह बहाल किया जाए, ताकि नदी फिर से स्वच्छ और सुरक्षित बन सके। मामले की अगली सुनवाई 24 फरवरी 2026 को होगी।