कोरोना से ठीक हुए मरीज कमजोरी, थकान, नींद न आना और दिमाग में जकड़न इत्यादि से परेशान हो रहे हैं। कई लोगों को कहना है कि जरा से काम से वे थक जाते हैं। रात को ठीक से सो भी नहीं पाते। इस बारे में डॉक्टरों का कहना है कि एक तो लोग खुद ही दवाई लेने लगते हैं और दूसरे जब वे इन लक्षणों से परेशान होते हैं तो चिकित्सक के पास देर से जाते हैं। इस कारण कोरोना मरीज को पूरी तरह से ठीक होने में समय लग जाता है।
एम्स के एसोसिएट प्रोफेसर नीरज निश्चल का इस बारे में कहना है कि समय के साथ हर घाव भर जाता है। जहां तक कोविड से ठीक होने वाले मरीजों की बात है तो उन्हे यह सोचना चाहिए कि वे एक बड़ी लड़ाई जीत चुके हैं। उन्हे सकारात्मक नजरिया रखते हुए अपना जीवन फिर से शुरू करना चाहिए। मीडिया में आने वाली खबरों की बाढ़ पर ध्यान रहेगा तो रात को नींद नहीं आएगी और दिमागी थकान भी होगी।
निश्चल ने बताया कि पिछली बार की तुलना में इस बार बीमारी भी गंभीर है और उसके लक्षण भी। मूल रूप से यह वायरस फेंफडो़ं की बीमारी है लेकिन यह पूरे शरीर पर असर डाल सकता है। चिकित्सकों का कहना है कि कोरोना से ठीक होने के बाद थकान और कमजोरी की जटिलताएं एक या दो प्रतिशत मामलों में ही देखी जा रही हैं। बहुत से लोगों में यह परेशानी चिकित्सकीय न होकर मनोवैज्ञानिक है। ऐसा नकारात्मक खबरों के बीच रहने से होता है। इसीलिए जो लोग कोरोना की जंग जीत चुके हैं उनका जीवन के प्रति सकारात्मक रवैया होना चाहिए।
कोरोना को परास्त कर लेने के बाद लोगों को चाहिए कि वे अच्छी खुराक लें और व्यायाम करें। इससे रिकवरी जल्द हो सकेगी। और हां, लोगों को यह भी समझना चाहिए कि कोई भी बीमारी एक धब्बे की तरह होती है जिसके निशान धीरे-धीरे जाते हैं। कोरोना के मामले में भी यही है।
इस बारे में फोर्टिस, गुड़गांव के डॉ. अमिताभ परती का कहना है कि कोरोना से उबर चुके लोगों को श्वसन संबंधी व्यायाम करने चाहिए। खुद को परेशान करने वाली खबरों और बातों से भी बचकर रखना चाहिए। कोरोना से जुड़ी बातों और खबरों पर ध्यान देने से मानसिक थकान और परेशानी होगी। फोन का इस्तेमाल भी सीमित कर देना चाहिए और हो सके तो सोशल मीडिया से भी परहेज किया जाए।