दक्षिण पश्चिम, पूर्व/शाहदरा, उत्तर-पश्चिम और मध्य/नई दिल्ली में चार सैनिक बोर्ड की स्थापना की जाएगी। 10 अधिकारियों वाले जिला सैनिक बोर्ड होंगे जहां पूर्व सैनिकों के पुनर्वास की जरूरतों को पूरा किया जाएगा। सैनिक बोर्ड की ओर से राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और जिलों में रहने वाले भूतपूर्व सैनिकों, विधवाओं और उनके आश्रितों के लिए नीति निर्माण, पुनर्वास और कल्याण योजनाओं को लागू की जाती हैं। बोर्ड का संचालन
रक्षा मंत्रालय के मानदंडों के मुताबिक होता है और इसके लिए भारत सरकार 60 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता प्रदान करेगी। शेष राशि राज्य सरकार वहन करेगी। उपराज्यपाल वीके सक्सेना राज्य सैनिक बोर्ड के अध्यक्ष भी हैं। एलजी ने दर्द और सदमे से जूझ रहे परिवारों के प्रति दिल्ली सरकार की उदासीनता के कारण करीब तीन वर्ष की देरी पर अफसोस जताया है। एलजी ने कहा है कि इस कदम के लिए तत्कालीन एलजी की तरफ से सैद्धांतिक मंजूरी दिए जाने के बाद भी इसपर निर्णय में दिल्ली सरकार की तरफ से देरी हुई।
इस पर निर्णय लेने में दिल्ली सरकार को करीब ढाई साल का समय लगा। 2019 में की गई इस पहल के करीब ढाई साल बाद कैबिनेट के फैसले के तहत मई में इस प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद मुख्यमंत्री द्वारा विधिवत हस्ताक्षर के साथ 27 सितंबर को उपराज्यपाल के पास भेजा गया। पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों की संख्या 7500 से अधिक होने के कारण दिसंबर 2019 में राज्य सैनिक बोर्ड की बैठक तत्कालीन उपराज्यपाल की अध्यक्षता में हुई।
दिल्ली में पूर्व सैनिकों और एसोसिएशनों से विचार विमर्श के आधार पर तीन सेवा मुख्यालय और चार जिला सैनिक बोर्ड की स्थापना का निर्णय लिया था। इसके बाद निर्णयों से राजस्व विभाग को अवगत कराते हुए इसे लागू करने के लिए ठोस प्रस्ताव तैयार करने को कहा गया था। रक्षा मंत्रालय की ओर से तय मानदंडों के मुताबिक चार जिला सैनिक बोर्ड की स्थापना पर करीब 16.69 करोड़ रुपये की लागत आएगी। इसका 60 फीसदी खर्च केंद्र सरकार की ओर से किया जाएगा जबकि शेष 40 दिल्ली सरकार करेगी।