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Delhi News: एसटीपी निविदा अनियमितता मामले में सत्येंद्र जैन को मिली जमानत

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राउज एवेन्यू कोर्ट ने कहा-एसीबी ने जैन को जल्दबाजी में गिरफ्तार किया
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। राउज एवेन्यू कोर्ट ने बृहस्पतिवार को आम आदमी पार्टी (आप) के नेता और पूर्व मंत्री सत्येंद्र जैन को दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) निविदा अनियमितता मामले में जमानत दे दी। विशेष न्यायाधीश (पीसी एक्ट) दिग्विनय सिंह ने टिप्पणी की कि एसीबी ने जैन को जल्दबाजी में गिरफ्तार किया। कोर्ट ने प्रारंभिक रूप से पाया कि एसीबी द्वारा चिन्हित व्हाट्सएप चैट्स में जैन का कोई लिंक नहीं बनता। न तो कोई फोन रिकॉर्ड और न ही एसएमएस संदेश उन्हें किकबैक या हवाला लेनदेन से जोड़ते हैं।


कोर्ट ने उल्लेख किया कि संबंधित ठेके जुलाई 2022 में दिए गए थे, जबकि जैन 30 मई 2022 से ही एक अन्य मनी लॉन्ड्रिंग मामले में हिरासत में थे। इसके अलावा, एसटीपी के काम की गुणवत्ता या ट्रीटमेंट मानकों पर किसी भी तरफ से कोई आपत्ति नहीं आई है। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) नियमित रूप से निगरानी कर रही है और कोई चिंता नहीं जताई गई। न्यायाधीश ने कहा कि जैन द्वारा लिए गए कुछ फैसलों से सवाल जरूर उठते हैं और वे निर्दोष भी नहीं हो सकते, लेकिन इस स्तर पर जमानत से इन्कार करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हैं। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि जांच एजेंसी को गिरफ्तारी से पहले गहन जांच कर और अधिक सबूत जुटाने चाहिए थे।
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एफआईआर और गिरफ्तारी के बीच अस्पष्ट और असाधारण देरी पर भी उठाया सवाल
एसीबी ने 18 अगस्त 2026 को जैन को गिरफ्तार किया था। मामला मई 2024 में निगरानी निदेशालय की शिकायत पर दर्ज हुआ था। इसमें एसटीपी अपग्रेडेशन ठेकों में निविदा शर्तों में हेराफेरी, आपराधिक साजिश और कथित रिश्वत भुगतान के आरोप हैं। जैन का पक्ष था कि उनके खिलाफ कोई मनी ट्रेल नहीं है। उन्होंने केवल वरिष्ठ अधिकारियों (सीईओ और चीफ इंजीनियर) द्वारा जांचे गए तकनीकी फाइलों को मंजूरी दी थी। साथ ही, एफआईआर दर्ज होने और गिरफ्तारी के बीच 27 महीने का अंतर यह दिखाता है कि हिरासत की कोई तत्काल जरूरत नहीं थी। कोर्ट ने एफआईआर (11 मई 2024) और गिरफ्तारी (18 अगस्त 2026) के बीच अस्पष्ट और असाधारण देरी पर भी सवाल उठाया। न्यायाधीश ने कहा कि इतने लंबे समय तक जांच एजेंसी ने आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया और आरोपी जांच में शामिल होते रहे। जांच के अंतिम चरण में अचानक गिरफ्तारी, मजबूत कारणों और परिस्थितियों में बदलाव के बिना, मनमानी का आरोप आमंत्रित करती है।
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