नई दिल्ली। राजनीतिक पार्टियों के प्रत्याशियों को चुनावों के दौरान निशुल्क वोटर लिस्ट व अन्य दस्तावेज प्रदान करने के प्रावधान को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि इस पर चुनाव आयोग को करीब 50 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं और वोटर लिस्ट के कागज के लिए लाखों पेड़ों को काटा जाता है जिससे पर्यावरण को नुकसान होता है। हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार व चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल व न्यायमूर्ति जसमीत सिंह की खंडपीठ ने दोनों पक्षों को स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि क्यों न निशुल्क वोटर लिस्ट व अन्य दस्तावेज प्रदान करने पर रोक लगाई जाए। अदालत ने मामले की सुनवाई 15 अप्रैल तय की है। याची ने यह भी आग्रह किया कि वोटर लिस्ट की हार्ड प्रतियां देने की अपेक्षा ईमेल के जरिये प्रत्याशियों को प्रदान करने का निर्देश दिया जाए।
याची आकाश गहलोत के अधिवक्ता हरज्ञान सिंह गहलोत ने खंडपीठ को बताया कि तय कानून के तहत पंजीकृत पार्टियों के प्रत्याशियों को चुुनावों में निशुल्क वोटर लिस्ट व अन्य दस्तावेज प्रदान किए जाते हैं। देशभर में हर राज्य में 8 से 10 पंजीकृत पार्टियां हैं। संसद के 543 व विधानसभा के लिए 4036 विधायकों को चुना जाता है। उन्होंने कहा कि चुनावों के दौरान तो सभी प्रत्याशी वोटर लिस्ट इत्यादि का इस्तेमाल करते हैं लेकिन उसके बाद इसे रद्दी में बेच दिया जाता है। यह दुरुपयोग है।
याची ने हाल ही में मध्यप्रदेश का हवाला देते हुए कहा कि 25 विधायकों ने चुनाव के 15 माह बाद ही त्यागपत्र दे दिया। इतना ही नहीं उन्होंने पुन: चुनाव लड़ा व फिर सभी दस्तावेज निशुल्क प्राप्त किए। यह सब सरकारी खर्च पर लिया गया जबकि उस समय देश कोरोना से जूूझ रहा था।
याची ने भी कहा कि मात्र पंजीकृत पार्टियों के प्रत्याशियों को निशुल्क वोटर लिस्ट देने से चुनाव लड़ने वाले अन्य प्रत्याशियों से यह भेदभाव और समानता के अधिकार का हनन है। उन्होंने आग्रह किया कि प्रत्याशियों को इस प्रावधान को रद्द किया जाए।