उच्च न्यायालय ने अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर द्वितीय की कानूनी उत्तराधिकारी का दावे कर लाल किले पर कब्जा दिलवाने की मांग संबंधी याचिका खारिज कर दी। याची सुल्ताना बेगम ने दावा किया है कि उत्तराधिकारी होने के चलते लाल किले पर उसका हक बनता है।
न्यायमूर्ति रेखा पल्ली ने सुनवाई के दौरान याची के अधिवक्ता से सवाल किया कि आपके मुवक्किल के परिवार को इस मुद्दे पर अपना हक जताने के लिए अदालत में आने में 150 साल से अधिक की देरी क्यों हुई। उन्होंने कहा मेरा इतिहास बहुत कमजोर है, लेकिन आप दावा करते हैं कि 1857 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा आपके साथ अन्याय किया गया था। देश के स्वतंत्र होने के बाद भी आपने ने चुप्पी साघे रखी, आपने 150 वर्षों से अधिक की देरी क्यों है? इतने सालों से आप क्या कर रहे थे?
अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि आपने अपने इस दावे का समर्थन करने के लिए कोई दस्तावेज नहीं दिया कि याचिकाकर्ता अंतिम मुगल सम्राट से संबंधित है। इसके अलावा आपने कोई विरासत चार्ट दाखिल नहीं किया है। हर कोई जानता है कि बहादुर शाह जफर को अंग्रेजों ने निर्वासित कर दिया था, लेकिन अगर उनके वारिसों ने कोई याचिका दायर नहीं की तो क्या वह ऐसा कर सकती हैं।
याचिकाकर्ता के वकील ने सुल्ताना बेगम को अनपढ़ महिला बताते हुए देरी को सही ठहराने की कोशिश की। हालांकि, अदालत ने तर्क को खारिज कर दिया और कहा कि समय पर कदम क्यों नहीं उठाए गए, इसका कोई औचित्य नहीं है। ऐसे में वे याचिका खारिज करती है। सुल्ताना बेगम ने अधिवक्ता विवेक मोरे के माध्यम से दायर अपनी याचिका में दावा किया कि वह बहादुर शाह जफर द्वितीय के परपोते की विधवा है।
उन्होंने तर्क दिया कि 1857 में स्वतंत्रता के पहले युद्ध के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा उनके परिवार को उनकी संपत्ति से वंचित कर दिया गया था, जिसके बाद बहादुर शाह जफर को देश से निर्वासित कर दिया गया था और लाल किले का कब्जा मुगलों से छीन लिया गया। ऐसे में लालकिले पर उनकी मुवक्किला का परिवारिक हक बनता है और सरकार को कब्जा उनकी मुवक्किला को देने का निर्देश दिया जाए। अदालत द्वारा याचिका खारिज करने का फैसला सुनते ही केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने टिप्पणी की कि वह आभारी हैं कि सरकार लाल किले से वंचित नहीं रही।