दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में पूर्व सैनिक घुन्ना राम की याचिका को मंजूर किया है। कोर्ट ने 2019 की सीएपीएफ सहायक कमांडेंट परीक्षा में पूर्व सैनिक श्रेणी के तहत उनकी उम्मीदवारी रद्द करने के यूपीएससी के फैसले को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर और न्यायमूर्ति ओम प्रकाश शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि पूर्व सैनिक नियम 1979 के नियम 5(सी) के तहत एक साल की अवधि को आवेदन की अंतिम तिथि से नहीं, बल्कि परीक्षा के परिणाम घोषित होने की तारीख से गिना जाएगा।
घुन्ना राम ने 28 अगस्त 2004 को सेना में सिपाही के रूप में भर्ती हुए थे और 27 सितंबर 2015 को हवलदार मेजर (तकनीकी) पद पर पदोन्नत हुए। उन्होंने 2019 की परीक्षा में पूर्व सैनिक कोटे से आवेदन किया था। उनकी सेना सेवा 31 दिसंबर 2020 को पूरी होनी थी। उन्होंने लिखित परीक्षा, शारीरिक परीक्षा और मेडिकल परीक्षा पास की तथा साक्षात्कार के लिए बुलाए गए थे। यूपीएससी ने अगस्त 2021 में उनकी उम्मीदवारी रद्द कर दी थी। कारण था कि आवेदन की अंतिम तिथि 20 मई 2019 थी, इसलिए उन्हें 19 मई 2020 तक सेना से मुक्त होना चाहिए था, जबकि वे दिसंबर 2020 में मुक्त हुए। कोर्ट ने यह तर्क खारिज कर दिया और कहा कि नियम 5(सी) में “नियुक्ति” शब्द का मतलब परीक्षा के परिणाम से जुड़ा है।
कोर्ट ने यूपीएससी के आरोपों को भी खारिज किया कि घुन्ना राम ने गलत जानकारी दी या दस्तावेज छिपाए थे। कोर्ट ने कहा कि दस्तावेज चोरी होने की घटना सही थी और फॉर्म में दी गई जानकारी में कोई विरोधाभास नहीं था। हालांकि कोर्ट ने सीधे नियुक्ति का आदेश नहीं दिया। कोर्ट ने कहा कि अगर पूर्व सैनिक कोटे में सहायक कमांडेंट का पद अभी भी खाली है तो उनकी उम्मीदवारी आगे बढ़ाई जाए। नियुक्ति होने पर उन्हें वरिष्ठता, सेवा निरंतरता और वेतन निर्धारण का लाभ मिलेगा, लेकिन वेतन के बकाया नहीं।