अदालत ने कहा, सिर्फ संदेह के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। रोहिणी कोर्ट ने नाबालिग से सामूहिक दुष्कर्म के मामले में नौ आरोपियों को बरी किया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में नाकाम रहा और केवल संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमित सहरावत ने फैसला सुनाते हुए कहा कि मामले में पीड़िता और उसकी मां के बयानों में गंभीर विरोधाभास है। हर बयान में दोनों ने अपने कथन बदले हैं और इन विरोधाभासों के कारण एक बयान दूसरे को नकार देता है। अदालत ने यह भी बताया कि 23 सितंबर 2023 को पीड़िता की मां ने पुलिस हेल्पलाइन पर कॉल की थी, लेकिन बाद में कहा कि यह मंदिर प्रबंधन और उनके बीच का विवाद था, क्योंकि प्रबंधन उन्हें परिसर खाली करने के लिए कह रहा था।
पुलिस जांच में सामने आया कि जिन नौ लोगों पर आरोप लगाए गए थे, उनमें से कुछ कथित अपराध के समय दिल्ली में मौजूद ही नहीं थे। अदालत ने कहा कि ऐसे हालात में आरोपियों पर मुकदमा चलाने या उन्हें सजा देने का कोई कानूनी आधार नहीं है। न्यायाधीश ने कहा कि कानून का सिद्धांत साफ है कि सिर्फ शक की बुनियाद पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने यह भी आदेश दिया कि पीड़िता को दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (डीएलएसए) द्वारा दी गई 3.75 लाख रुपये की अंतरिम मुआवजा राशि वापस ली जाए, क्योंकि जांच में कोई अपराध साबित नहीं हुआ। यह मामला सितंबर 2023 का है। दिल्ली पुलिस ने नौ आरोपी के खिलाफ आरोपपत्र दायर किया था। आरोप था कि उन्होंने एक नाबालिग लड़की का अपहरण कर गाजियाबाद ले जाकर उसके साथ दुष्कर्म किया। अदालत ने सभी नौ आरोपियों को बरी करते हुए कहा कि मामला पूरी तरह संदेह पर आधारित है और सबूत अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।