कंडोम दवा है या मेडिकल डिवाइस, यह मुद्दा दिल्ली हाईकोर्ट में समक्ष आया है। अदालत ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर इस मुद्दे पर जवाब मांगा है।
मुख्य न्यायाधीश एन.वी.रामना व न्यायमूर्ति मनमोहन की खंडपीठ ने सरकार को 13 दिसंबर तक स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि कंडोम को दवा क्यों माना है।
अदालत ने कंडोम बनाने वाली एक कंपनी ने सरकार के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें कंडोम को दवा की श्रेणी में रखकर आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत मानते हुए इसके दाम पर नियंत्रण लगाया है।
सुनवाई के दौरान याची के अधिवक्ता ने जोर दिया कि कंडोम मेडिकल डिवाइस है और इसे दवा की श्रेणी में रखते हुए दामों पर नियंत्रण नहीं लगाया जा सकता।
वहीं अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि कंडोम पर लगाए जाने वाला लुब्रीकेंट दवा की श्रेणी में आता है, इसलिए इसे इस श्रेणी में रखा जाना चाहिए।
खंडपीठ ने सरकार रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय को शपथपत्र सहित जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
याची के अधिवक्ता ने कहा कि मंत्रालय ने 5 नवंबर 2013 को अधिसूचना जारी कर कंडोम को दवा की श्रेणी में रखते हुए इसके दामों पर नियंत्रण लगा दिया।
उन्होंने कहा सरकार का फैसला बदनीयती व भेदभाव करने वाला है। इतना ही नहीं भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 व 19 (1)(जी) के तहत आम लोगों को मिले अधिकार का भी हनन है।
उन्होंने कहा सरकार जनसंख्या पर नियंत्रण लगाने के लिए एक तरफ तो 55 प्रतिशत कंडोम नि:शुल्क वितरित करने के अलावा कंडोम पर सब्सिडी दे रही है।
दूसरी तरफ इस प्रकार का निर्णय लोगों को अपनी पसंद के उच्च श्रेणी के कंडोम खरीदने से वंचित कर रहा है।