नई दिल्ली। इंडिया गेट पर युवाओं के लिए न तो अन्ना का आह्वान था और न ही उनके वॉलंटियर्स, फिर भी आक्रोशित युवाओं की भीड़ पूरे राजपथ पर सुबह से शाम तक देखने को मिली। अधिकतर प्रदर्शनकारियों का कहना था कि वे अन्ना की प्रेरणा से ही यहां एकत्र हुए।
बता दें कि अन्ना ने अपनी गिरफ्तारी के बाद देश के युवाओं से आह्वान किया था कि यह परिवर्तन की लड़ाई है। परिवर्तन जब तक नहीं आएगा, तब तक सही आजादी नहीं आएगी। सही गणतंत्र नहीं आएगा, सही प्रजातंत्र नहीं आएगा व लोकशाही नहीं आएगी। परिवर्तनवादी लड़ाई जो शुरू हो गई है, उसे अहिंसा के रास्ते लड़ते जाना है। 16 अगस्त 2011 में उनके इस आह्वान का असर शनिवार को
इंडिया गेट पर युवा प्रदर्शनकारियों के बीच देखने को मिला, जो केवल शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात सरकार के कानों तक पहुंचाना चाहते थे। इंडिया गेट से रायसीना हिल्स तक डटे रहे युवाओं की भीड़ ने एक बार फिर से अन्ना के आंदोलन की याद दिला दी। युवाओं को तितर-बितर करने की काफी कोशिश की गई, इसके बावजूद उनका जोश बढ़ता जा रहा था। उन्हें सरकार से इस मामले में आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस कदम चाहिए थे। अधिकतर प्रदर्शनकारियों का कहना था कि अन्ना ने ही सिखाया कि कैसे शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होकर प्रदर्शन किया जाता है। उन्हें अपनी आवाज सरकार तक पहुंचाने का यही तरीका ठीक लगा। लोगों में दबे गुस्से का ही असर रहा कि आंसू गैस, लाठियों का प्रहार भी उन्हें अपनी जगह से टस से मस नहीं कर पाया। घंटों तक उनका जोश और जुनून कम नहीं हुआ। कोई लीडर न होने के बाद भी प्रदर्शनकारियों को बस एक बात याद थी कि अपनी आवाज सरकार तक शांतिपूर्ण ढंग से ही पहुंचानी है।
वहीं न कोई मंच था, न कोई झंडा और न ही आम धरना-प्रदर्शनों की नेतागीरी। राजपथ पर युवा आक्रोश देश को शर्मसार करने वाली घटना पर फूटा। आंदोलन का यही स्वत: स्फूर्त चरित्र दिल्ली पुलिस की परेशानी व आंदोलन की ताकत बना। भारी नारेबाजी और हंगामे के बीच दिन-भर न तो प्रशासन से कोई बातचीत के लिए आगे आया और न ही पुलिस दूसरे आंदोलनों की तरह नेतृत्व को जेल भेजकर जन सैलाब को हटाने में कामयाब रही। रायसीना हिल्स से खदेड़े जाने पर आंदोलनकारी देर रात तक इंडिया गेट पर जमे रहे। यहां उन्होंने कैंडल मार्च निकाला और बलात्कारियों को फांसी देने की मांग पूरी न होने पर प्रदर्शन जारी रखने की कसमें खाईं।