निगम में प्रशासक और आयुक्त की अलग-अलग भूमिका होगी। प्रशासक के पास विधायी पक्ष के अधिकार होंगे। वह निगम के नीतिगत निर्णयों पर मुहर लगाएंगे।
इसके अलावा वह अधिकारियों को विकास कार्य करने एवं समस्याएं दूर करने का भी निर्देश दे सकेंगे, जबकि आयुक्त के पास प्रशासनिक पक्ष की जिम्मेदारी होगी और उन्हें निगम के कार्यों को अमलीजामा पहनाना होगा और नीति एवं योजनाएं बनवानी होगी।
निगम के चुनाव नहीं होने तक उसे चलाने के लिए प्रशासक की नियुक्ति की जाएगी। प्रशासक के पास विधायी पक्ष (नगर निगम सदन) के सभी अधिकार होंगे और वह नगर निगम के संबंध में नीतिगत निर्णय लेंगे। इस तरह उन्हें नगर निगम के साथ-साथ आम जनता के हितों का भी ध्यान रखना होगा। आयुक्त की ओर से विभिन्न मामलों में तैयार किए जाने वाले प्रस्ताव उनके समक्ष प्रस्तुत किए जाएंगे। वह असहमत होने पर प्रस्तावों को रद्द करने के साथ-साथ उनमें संशोधन करने का निर्देश दे सकेंगे। इसके अलावा वह सहमत होने पर प्रस्तावों को पास भी कर सकेंगे।
उधर आयुक्त के ऊपर नगर निगम के समस्त कार्य कराने की जिम्मेदारी होगी। इसके अलावा उनके कंधों पर विकास कार्य एवं समस्याएं दूर करने के साथ-साथ आम जनता को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध की जिम्मेदारी होगी।
तीनों निगम अभी नियमित कार्य ही कर सकेंगे
निगमों का विलय होने के बाद दिल्ली नगर निगम के गठन की प्रक्रिया पूरी होने तक नियमित कार्य हो सकेंगे। सभी विभागों की एक नीति बनाने और इन विभागों के प्रमुखों की नियुक्ति होने पर ही नीतिगत निर्णय लेने की शुरुआत होगी।