उच्च न्यायालय ने कहा कि छोटे नर्सिंग होम के डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ ने भी हजारों मरीजों को महामारी की पहली और दूसरी लहर के दौरान इलाज प्रदान किया है। ऐसे में इन नर्सिंग होम में कार्यरत डॉक्टरों व अन्य स्टाफ को अनुग्रह राशि से वंचित करना उचित नहीं माना जा सकता।
अदालत ने कहा मात्र इलाज के लिए तय अस्पतालों में कार्यरत चिकित्सकों को अनुग्रह राशि प्रदान करने के निर्णय को न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। न्यायमूर्ति विपिन सांघी और न्यायमूर्ति जसमीत सिंह की पीठ ने 50 बिस्तरों के कम नर्सिंग होम में कार्यरत डॉक्टर की कोविड से मौत मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि केवल इसलिए कि कुछ नर्सिंग होम को उनकी क्षमता के कारण अधिग्रहित नहीं किया गया अनुग्रह राशि से वंचित करना उचित नहीं है। पीठ ने कहा ऐसे नर्सिंग होम में काम करने वाले डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ भी कोविड मरीजों का इलाज कर पीड़ित होने का जोखिम उठा रहे थे।
पीठ ने कहा यह एक सर्वविदित तथ्य है कि पहली और दूसरी लहर के दौरान महामारी के चरम पर छोटे नर्सिंग होम भी दिल्ली के हजारों निवासियों को कोविड के खिलाफ उपचार प्रदान कर रहे थे और यदि उनकी संख्या को एक साथ रखा जाए तो उनकी बेड संख्या सरकारी अस्पताल व उन अस्पताल से अधिक होगी, जिन्हें कोविड इलाज के लिए आरक्षित किया गया था। पीठ जून 20 में महामारी की पहली लहर के दौरान एक डॉक्टर की मौत को लेकर उनकी पत्नी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही है। डॉक्टर हरीश कुमार जीटीबी नगर के न्यू लाइफ अस्पताल में सेवारत थे और कोविड ड्यूटी पर थे।
अदालत के पूछने पर याची ने कहा सेवा के दौरान कोविड से मरने वाले सभी फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं, डॉक्टरों को दिल्ली सरकार द्वारा प्रदान अनुग्रह राशि के लिए आवेदन किया था, लेकिन उन्हें अनुग्रह राशि नहीं मिली। दिल्ली सरकार के वकील गौतम नारायण ने पीठ को बताया कि दिल्ली सरकार कैबिनेट निर्णय में ऐसे मामलों में केवल सरकारी अस्पतालों या सरकार द्वारा आरक्षित अन्य अस्पतालों में सेवारत डॉक्टरों और अन्य पैरामेडिकल कर्मचारियों के संबंध में अनुग्रह राशि प्रदान करने का प्रावधान है।
उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता के पति 50 बिस्तरों से कम वाले नर्सिंग होम में सेवा दे रहे थे जिसकी दिल्ली सरकार ने मांग नहीं की थी। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता के पति की ड्यूटी के दौरान कोविड से मृत्यु हो गई लेकिन यह मामला वर्तमान में कैबिनेट के फैसले के दायरे में नहीं आता है। पीठ ने उनके तर्क पर कहा कि उनकी दृष्टि में प्रथम दृष्टया दिल्ली सरकार द्वारा की जाने वाली अनुग्रह राशि के भेद को उचित नहीं ठहराया जा सकता है। पीठ ने कहा केवल इसलिए कि कुछ नर्सिंग होम को उनकी क्षमता के कारण अपेक्षित नहीं किया गया इस तथ्य को दूर नहीं करता कि ऐसे नर्सिंग होम में काम करने वाले डॉक्टर और पैरामेडिकल कर्मचारी भी मौत के जोखिम का सामना कर रहे थे।
पीठ के रवैये को देख दिल्ली सरकार के वकील ने कहा कि वह न केवल कैबिनेट के फैसले को रिकॉर्ड करने के लिए एक हलफनामा दाखिल करेंगे बल्कि याचिकाकर्ता के पति के मामले में अनुग्रह राशि देने के मामले पर पुनर्विचार भी करेंगे। अदालत ने उन्हें हलफनामा चार सप्ताह के भीतर दायर करने का निर्देश देते हुए सुनवाई 11 मार्च तय की है। दरअसल मुख्य याचिका ऋण वसूली न्यायाधिकरण (डीआरटी) के समक्ष लंबित कार्यवाही से संबंधित है, जिसमें रिसीवर को महिला की गिरवी रखी गई संपत्ति फिजिकल कब्जा लेना है। उच्च न्यायालय ने सुनवाई की अंतिम तिथि पर उसकी बेदखली पर रोक लगा दी थी।