हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल निवासी आसिफ हुसैन को पाकिस्तानी बताकर नरेला लामपुर स्थित सेवा सदन निर्वासन केंद्र में रखने को गैरकानूनी ठहराया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकार ऐसा कोई साक्ष्य पेश नहीं कर पाई कि आसिफ पाकिस्तानी है या उसके खिलाफ कोई मामला विचाराधीन है। अदालत ने आसिफ को तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया।
न्यायमूर्ति सिद्घार्थ मृदुल व न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी की खंडपीठ ने आसिफ की पत्नी रूमा बीबी द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया। खंडपीठ ने कहा कि आसिफ के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले में वह सजा पूरी कर चुका है। उसके खिलाफ कोई अन्य मामला विचाराधीन नहीं है। ट्रायल कोर्ट विदेशी अधिनियम के तहत दर्ज मामले में उसे बरी कर चुकी है।
खंडपीठ ने कहा कि आसिफ के पास कोलकाता के अधिकारी द्वारा जारी वैध पासपोर्ट के अलावा चुनाव आयोग द्वारा जारी वैध वोटर आई-कार्ड भी है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने भी कहा है कि अब उसके खिलाफ कार्रवाई का आधार नहीं बचा। ऐसे में सजा पूरी होने के बावजूद आसिफ को बिना कारण के हिरासत में रखना कानून का गंभीर उल्लंघन है। सुनवाई में सहायता के लिए नियुक्त वरिष्ठ अधिवक्ता दयान कृष्णन ने भी अपनी रिपोर्ट में आसिफ की हिरासत को गलत बताया है।
अदालत ने याचिका स्वीकार कर उसे रिहा करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि यदि कभी भी उससे पूछताछ की जरूरत हुई तो वह संबंधित अधिकारी के समक्ष पेश होगा। जहां तक केंद्र में रहन-सहन के स्तर और उचित खाने की कमी का मुद्दा है तो इस पर वे 21 मई को सुनवाई करेंगे।
याची ने तर्क रखा था कि उनके पति आसिफ को दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा ने आईपीसी की विभिन्न धाराओं के अलावा विदेशी अधिनियम और आफिशियल एक्ट के तहत नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर 13 दिसंबर 2012 को गिरफ्तार किया था। ट्रायल कोर्ट ने उसे 28 सितंबर 2016 में 9 वर्ष कैद की सजा देते हुए विदेशी अधिनियम के आरोप से बरी कर दिया था। हाईकोर्ट ने 7 नवंबर 2019 को फैसले को बहाल रखा था। विभिन्न समय पर सजा में मिली छूट के बाद उसे रिहा हो जाना चाहिए था।