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‘सौ संदेह मिलकर साक्ष्य नहीं बन सकते’

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नई दिल्ली। अदालत ने दिल्ली दंगों से जुड़े हत्या के प्रयास के एक मामले में पुलिस की जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए दो लोगों को इस आरोप से मुक्त कर दिया। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि उनके खिलाफ दंगा करने व गैरकानूनी रूप से एकत्रित होने का मामला चलाया जा सकता है। अदालत ने दोस्तो एवस्की की रूसी कृति ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ के हवाले से पुलिस को नसीहत दी कि ‘सौ खरगोश मिलाकर आप घोड़ा नहीं बना सकते और सौ संदेह मिलकर साक्ष्य नहीं बन सकते।’
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अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमिताभ रावत ने आरोपी इमरान और बाबू को आईपीसी की धारा-307 (हत्या का प्रयास) और शस्त्र अधिनियम के आरोप से बरी करते हुए कहा कि यह मामला ऐसा है, जिसमें कहीं नहीं है कि किसने गोली चलाई, किस पर चलाई और कहां चलाई? जब मामले में पीड़ित ही नहीं है तो कैसे आरोपियों के खिलाफ हत्या के प्रयास का आरोप लगाया जा सकता है?
अदालत ने कहा कि पुलिस जांच में पीड़ित ही नहीं है और न ही वह कभी पुलिस के पास नहीं आया। पीड़ित ने गोली चलाने के बारे में अथवा भीड़ या दंगाइयों के बारे में कोई बयान नहीं दर्ज कराया।
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यह मामला वेलकम इलाके में राहुल नाम के व्यक्ति पर कथित तौर पर गोली चलाने के सिलसिले में दर्ज किया गया था। अदालत ने फैसले में कहा कि आपराधिक न्याय प्रणाली के अनुसार, आरोपी को दोषी ठहराने के लिए उसके खिलाफ कुछ सामग्री होनी चाहिए। पूर्वाग्रह सबूत का स्थान नहीं ले सकता।
आरोप पत्र में धारा-307 या शस्त्र अधिनियम के तहत मामला चलाने के लिए कोई सामग्री नहीं है। हालांकि दोनों आरोपियों के खिलाफ गैरकानूनी तरीके से एकत्रित होने और दंगा करने का मामला चलाया जा सकता है। उन्होंने मामले को मजिस्ट्रेट की अदालत को हस्तांतरित करते हुए कहा कि यह मामला विशेष तौर पर सत्र न्यायालय में सुनने योग्य नहीं है।
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