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Holi Celebrations : गौतमबुद्धनगर की 300 साल पुरानी परंपरा और मेवात में भाईचारे की रंगत

Wed, 08 Mar 2023 06:32 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

ग्रेटर नोएडा के आसपास खेरली हाफिजपुर, रूपवास, दुजाना, देवटा, जमालपुर जैसे गांवों में ढाई सौ से तीन सौ वर्ष पुरानी परंपरा आज भी चली आ रही है। एक तरफ जहां होली का रंग चल रहा होता है, तो दूसरी तरफ तरफ नगाड़े की धुनों पर होली के गीत गाकर युवा और बुजुर्ग त्योहार में रंग जमा देते हैं।
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उत्सव की परंपरा... - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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होली शुरू होते ही जिले के कई गांवों में कानों में पड़ती बंब (नगाड़ों) और मृदंग की थाप आसपास मौजूद लोगों को थिरकने पर मजबूर कर देती है। ग्रेटर नोएडा के आसपास खेरली हाफिजपुर, रूपवास, दुजाना, देवटा, जमालपुर जैसे गांवों में ढाई सौ से तीन सौ वर्ष पुरानी परंपरा आज भी चली आ रही है। एक तरफ जहां होली का रंग चल रहा होता है, तो दूसरी तरफ तरफ नगाड़े की धुनों पर होली के गीत गाकर युवा और बुजुर्ग त्योहार में रंग जमा देते हैं। कई बार इनका साथ घंटे और अन्य वाद्य यंत्रों की धुनों से भी दिया जाता है। वर्षों से नगाड़ा बजाने की प्रतियोगिता युवाओं को भी उत्साहित करती है। प्रतियोगिता में हिस्सा लेेना और जीतकर पगड़ी बंधवाना भी युवाओं के लिए शान बन गया है। अब यह केवल प्रतियोगिता न रहकर ग्रामीणों का एक स्थान पर इकट्ठा होकर मेलजोल बढ़ाने का का प्रतीक बन गई है। बिलासपुर के खेरली हाफिजपुर निवासी बुजुर्ग ग्रामीणों का कहना है कि ढाई से तीन सौ वर्ष पहले ग्रामीण एक स्थान पर एकत्र होते थे। इस दौरान गांव का प्रधान नगाड़ा बजाकर होली खेलने की घोषणा करता था। धीरे-धीरे अन्य लोगों ने भी होली के अवसर पर नगाड़ा बजाने और नृत्य करना शुरू कर दिया। दादरी के रूपवास गांव निवासी ग्रामीणों का कहना है कि पुराने समय में छोटे नगाड़े बजाए जाते थे। अब सभी स्थानों पर सुविधा के अनुसार बड़े नगाड़े बजाए जाने लगे। अमर उजाला से संदीप वर्मा, ऋषिपाल सिंह और हरिप्रकाश बावा की एक रिपोर्ट ... 

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सिर पर पगड़ी बांध करते हैं सम्मानित

  • दादरी क्षेत्र के दुजाना गांव में वर्षों की परंपरा आज भी कायम है। यह गांव जिले की सबसे बड़ी ग्राम पंचायत है। यहां होली पर बंब वादन की प्रतियोगिता का आयोजन होता है। गांव में होली वाला कुआं के नाम से विख्यात स्थान पर यह प्रतियोगिता आयोजित की जाती है। प्रतियोगिता में गांव का प्रत्येक मोहल्ला प्रतिभाग करता है। गांव के लोग नगाड़ा बजाने वाले लोगों को गुड़ की ढैय्या (लगभग ढाई किलो गुड़) देकर और पगड़ी बांध कर सम्मानित करते हैं।
  • दुजाना गांव में ही वर्षों पुराना दादी सती का मंदिर है। दादी सती मंदिर परिसर में होली पर हर वर्ष लगने वाले मेले में बंब प्रतियोगिता चली आ रही है। ग्रामीणों का कहना है यह मेला लगभग 300 वर्षों से लगता रहा है। मेला लगने की कहानी है कि दुजाना के भगीरथ का विवाह हरियाणा के पाली गांव निवासी रामकौर से हुआ था। शादी के कुछ समय बाद ही युद्ध लड़ने गए भगीरथ शहीद हो गए। सूचना आने से पूर्व पत्नी रामकौर को कुछ अनिष्ट होने का आभास हो गया था। सूचना मिलने पर रामकौर ने अग्नि समाधि ले ली थी। ग्रामीणों ने उनके समाधि स्थल पर मंदिर का निर्माण कराया व वहां मेला लगने की परंपरा आरंभ हुई। तभी से इस स्थल पर भी नगाड़ा बजाने की परंपरा जारी है।

दादी सती के मंदिर पर लगने वाले मेले में वर्षों से बजता है नगाड़ा

  • दुजाना गांव में ही वर्षों पुराना दादी सती का मंदिर है। दादी सती मंदिर परिसर में होली पर हर वर्ष लगने वाले मेले में बंब प्रतियोगिता चली आ रही है। ग्रामीणों का कहना है यह मेला लगभग 300 वर्षों से लगता रहा है। मेला लगने की कहानी है कि दुजाना के भगीरथ का विवाह हरियाणा के पाली गांव निवासी रामकौर से हुआ था। शादी के कुछ समय बाद ही युद्ध लड़ने गए भगीरथ शहीद हो गए। सूचना आने से पूर्व पत्नी रामकौर को कुछ अनिष्ट होने का आभास हो गया था। सूचना मिलने पर रामकौर ने अग्नि समाधि ले ली थी। ग्रामीणों ने उनके समाधि स्थल पर मंदिर का निर्माण कराया व वहां मेला लगने की परंपरा आरंभ हुई। तभी से इस स्थल पर भी नगाड़ा बजाने की परंपरा जारी है।

होलिका दहन का शुभारंभ  बंब बजाकर
दादरी के गांव रूपवास में नगाड़ा बजाकर होलिका दहन करने की परंपरा है। यहां होलिका दहन का शुभारंभ कई पीढि़यों से ही मुकदम परिवार करता है। रूपवास में नगाड़ा बजाने की प्रथा करीब तीन सौ वर्षों से चली आ रही है। गांव के दोनों अलग-अलग मोहल्ले के लोग होली के करीब तीन सप्ताह पहले ही तैयारी शुरू कर देते हैं। यहां गुटों में बंटकर दोनों ओर युवा सात-सात नगाड़ों को घंटों तक बजाते हैं।

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कई-कई घंटे चलती है प्रतियोगिता
नगाड़ा बजाने के लिए एकल और टीम के साथ प्रतियोगिता होती हैं। नगाड़ा बजाने में अभ्यास के साथ-साथ बड़ी ताकत भी लगती है। ऐसे में कई-कई घंटे नगाड़ा बजाने की प्रतियोगिता होती है। इसमें दम दिखाने वाले लोगों को याद रहते हैं।

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मेवात में भाईचारे का रंग गाढ़ा

मेवात में गंगा-जमुनी तहजीब सही मायनों में जिंदा है और इसकी बानगी तीज-त्योहारों पर नजर भी आती है। इन त्योहारों में होली भी ऐसा पर्व है, जहां हिंदू-मुस्लिम एक-दूसरे को गुलाल लगाकर खुशी मनाते हैं। यहां आज भी होली मिलन कार्यक्रमों का चलन है। जिसमें दोनों संप्रदाय के लोग एकत्र होकर एक-दूसरे को बधाई देते हैं और मिठाई खिलाते हैं। 

यहां के हिंदू-मुस्लिम का आपसी भाईचारा इतना मजबूत है कि देश का बंटवारा हो या फिर राम मंदिर-बाबरी मस्जिद का झगडा। बड़ी से बड़ी घटनाएं भी इस भाई-चारे को नहीं तोड पाईं। यहां के मेव समाज के लोग अपने आप को सूर्यवंशी और चंद्रवंशी मानते हैं। हिंदू समाज की तरह आज भी मेवात के मेव समाज के लोग गौत्र बनाकर शादी करते हैं। मेव समाज के अधिकतर गोत्र हिंदू समाज से मिलते है। जैसे डागर, बडगुजर, सहरावत गोत्र मुस्लिमों और हिंदुओं में मौजूद हैं। इसी गौत्रपाल का असर है कि यहां के मुसलमानों ने अंग्रेजों, मुगलों को कभी अपना नहीं माना, बल्कि हिंदुस्तान के हिंदू राजाओं के साथ मिलकर उनके खिलाफ जंग लडी।

बृज का असर
कस्बा पिनगवां निवासी 75 वर्षीय संतराम पटेल का कहना है कि मेवात क्षेत्र ब्रिज के 84 कोस की परिधि में आता है। इसकी वजह से यहां के सभी धर्मों के लोगों पर बृज रंग चढ जाता है। उन्होने बताया कि 1980 तक मेवात के अधिकतर मुस्लिम समाज के लोग हिंदुओं के साथ मिलकर होली खेलते थे। कस्बा पिनगवां में एक महिना तक होली की चौपाई गाई जाती थी। लाहाबास गांव के हाजी रसूला और उनकी टीम जब तक पिनगवां नहीं आती तो चौपाई शुरू नहीं होती थी। रात भर चौपाई और रसियों का दौर चलता रहता था। शराब की जगह ठंडाई परोसी जाती थी। उन्होंने माना कि कुछ हुड़दंगियों की वजह से इस त्योहार की लोकप्रियता मेवात में केवल हिन्दू समाज तक ही सिमट कर रह गई है। खास बात यह है मेवात जिले में कहीं किसी कस्बे व गांव में एक-दूसरे को रंग लगाने पर हिंदू-मुस्लिम का झगड़ा नहीं हुआ। जो अपने आप में बड़ी बात ही नहीं बल्कि आपसी भाईचारे का बड़ा संदेश है। यहां त्यौहार पर सब एक-दूसरे की भावनाओं की कदर करते हैं।

मुस्लिम गांवों में चौकों का नाम होली चौक
मालब-घासेड़ा सहित दर्जनों मुस्लिम बहुल्य गांवों में आज भी गांव के अंदर बने चौकों का नाम होली चौक है। ये चौक इस त्यौहार के दौरान भाईचारे के गवाह हैं। मेव पंचायत के प्रवक्ता मोहम्मद कासिम मेवाती कहते हैं यह हमारी सांझी संस्कृति है। जिसे कभी मिटाया व भुलाया नहीं जा सकता। धर्म भले ही अलग-अलग है, लेकिन भाईचारा आज भी कायम हैं। दोनों पक्षों की तरफ से होली के साथ-साथ अन्य त्योहारों पर भी एक-दूसरे के साथ मिलकर मनाते हैं। मेवात में होली ही नहीं, दीवाली व ईद मिलन समारोह भी मनाए जाते हैं। हाल की में किशनगढ़-खैरतल में दो दिवसीय होली मिलन समारोह आयोजित किया गया। इसमें दोनों समुदाय के लोग भारी संख्या में एकत्र हुए और एक-दूसरे को गले लगाकर होली मनाई। चंदेनी के आसिफ बताते हैं होली के साथ-साथ दीवाली से पहले होने वाली रामलीला में आज भी कलाकार से लेकर दर्शक की बड़ी संख्या मेव समाज की होती है। कुछ समय पहले लोग दूसरे गांवों में भी रात होली सुनने के लिए जाया करते थे। मेव समाज के कुछ लोग होली गाने के लिए भी दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे। आज भी गांवों में होली चौक हैं और होली दहन व होली खेलते हैं। फिरोजपुर झिरका में पूर्वमंत्री आजाद मोहम्मद रामलीला कमेटी के संरक्षक हैं तो वो रामलीला के लिए अपने निजी कोष से दान भी देते हैं। ऐसे एक नहीं कई उदाहरण मेवात में देखे जा सकते हैं।

रात भर होली के रसिया और चौपाइयों का लेते थे मजा
नूंह जिले का पुन्हाना व पिनगवां कस्बा बृज से सटा हुआ है। यहां यूपी की बृज होली के गीत-संगीत के साथ एक-दूसरे को रंग लगाते नजर आते हैं। यहां भी नजारा हिंदू-मुस्लिम एकता वाला होता है। सिंगार, बिछौर, नई सहित कई गांव ऐसे हैं जहां दोनों आबादी अच्छे से होली में रंग में रंग जाती है। हालांकि अब पिछले कुछ सालों में फर्क जरूर पड़ा है। लेकिन होली पर कोई बुरा नहीं मानता। एक जमाना ऐसा था जब मेवात के मुसलमान और हिंदू मिलकर ढोल नगाड़े की ताल पर रात भर होली के रसिया और चौपाइयों का मजा लेते थे। पिनगवां कस्बा की होली तो मानों मुसलमानों के बगैर अधूरी थी।
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