मेवात में गंगा-जमुनी तहजीब सही मायनों में जिंदा है और इसकी बानगी तीज-त्योहारों पर नजर भी आती है। इन त्योहारों में होली भी ऐसा पर्व है, जहां हिंदू-मुस्लिम एक-दूसरे को गुलाल लगाकर खुशी मनाते हैं। यहां आज भी होली मिलन कार्यक्रमों का चलन है। जिसमें दोनों संप्रदाय के लोग एकत्र होकर एक-दूसरे को बधाई देते हैं और मिठाई खिलाते हैं।
यहां के हिंदू-मुस्लिम का आपसी भाईचारा इतना मजबूत है कि देश का बंटवारा हो या फिर राम मंदिर-बाबरी मस्जिद का झगडा। बड़ी से बड़ी घटनाएं भी इस भाई-चारे को नहीं तोड पाईं। यहां के मेव समाज के लोग अपने आप को सूर्यवंशी और चंद्रवंशी मानते हैं। हिंदू समाज की तरह आज भी मेवात के मेव समाज के लोग गौत्र बनाकर शादी करते हैं। मेव समाज के अधिकतर गोत्र हिंदू समाज से मिलते है। जैसे डागर, बडगुजर, सहरावत गोत्र मुस्लिमों और हिंदुओं में मौजूद हैं। इसी गौत्रपाल का असर है कि यहां के मुसलमानों ने अंग्रेजों, मुगलों को कभी अपना नहीं माना, बल्कि हिंदुस्तान के हिंदू राजाओं के साथ मिलकर उनके खिलाफ जंग लडी।
बृज का असर
कस्बा पिनगवां निवासी 75 वर्षीय संतराम पटेल का कहना है कि मेवात क्षेत्र ब्रिज के 84 कोस की परिधि में आता है। इसकी वजह से यहां के सभी धर्मों के लोगों पर बृज रंग चढ जाता है। उन्होने बताया कि 1980 तक मेवात के अधिकतर मुस्लिम समाज के लोग हिंदुओं के साथ मिलकर होली खेलते थे। कस्बा पिनगवां में एक महिना तक होली की चौपाई गाई जाती थी। लाहाबास गांव के हाजी रसूला और उनकी टीम जब तक पिनगवां नहीं आती तो चौपाई शुरू नहीं होती थी। रात भर चौपाई और रसियों का दौर चलता रहता था। शराब की जगह ठंडाई परोसी जाती थी। उन्होंने माना कि कुछ हुड़दंगियों की वजह से इस त्योहार की लोकप्रियता मेवात में केवल हिन्दू समाज तक ही सिमट कर रह गई है। खास बात यह है मेवात जिले में कहीं किसी कस्बे व गांव में एक-दूसरे को रंग लगाने पर हिंदू-मुस्लिम का झगड़ा नहीं हुआ। जो अपने आप में बड़ी बात ही नहीं बल्कि आपसी भाईचारे का बड़ा संदेश है। यहां त्यौहार पर सब एक-दूसरे की भावनाओं की कदर करते हैं।
मुस्लिम गांवों में चौकों का नाम होली चौक
मालब-घासेड़ा सहित दर्जनों मुस्लिम बहुल्य गांवों में आज भी गांव के अंदर बने चौकों का नाम होली चौक है। ये चौक इस त्यौहार के दौरान भाईचारे के गवाह हैं। मेव पंचायत के प्रवक्ता मोहम्मद कासिम मेवाती कहते हैं यह हमारी सांझी संस्कृति है। जिसे कभी मिटाया व भुलाया नहीं जा सकता। धर्म भले ही अलग-अलग है, लेकिन भाईचारा आज भी कायम हैं। दोनों पक्षों की तरफ से होली के साथ-साथ अन्य त्योहारों पर भी एक-दूसरे के साथ मिलकर मनाते हैं। मेवात में होली ही नहीं, दीवाली व ईद मिलन समारोह भी मनाए जाते हैं। हाल की में किशनगढ़-खैरतल में दो दिवसीय होली मिलन समारोह आयोजित किया गया। इसमें दोनों समुदाय के लोग भारी संख्या में एकत्र हुए और एक-दूसरे को गले लगाकर होली मनाई। चंदेनी के आसिफ बताते हैं होली के साथ-साथ दीवाली से पहले होने वाली रामलीला में आज भी कलाकार से लेकर दर्शक की बड़ी संख्या मेव समाज की होती है। कुछ समय पहले लोग दूसरे गांवों में भी रात होली सुनने के लिए जाया करते थे। मेव समाज के कुछ लोग होली गाने के लिए भी दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे। आज भी गांवों में होली चौक हैं और होली दहन व होली खेलते हैं। फिरोजपुर झिरका में पूर्वमंत्री आजाद मोहम्मद रामलीला कमेटी के संरक्षक हैं तो वो रामलीला के लिए अपने निजी कोष से दान भी देते हैं। ऐसे एक नहीं कई उदाहरण मेवात में देखे जा सकते हैं।
रात भर होली के रसिया और चौपाइयों का लेते थे मजा
नूंह जिले का पुन्हाना व पिनगवां कस्बा बृज से सटा हुआ है। यहां यूपी की बृज होली के गीत-संगीत के साथ एक-दूसरे को रंग लगाते नजर आते हैं। यहां भी नजारा हिंदू-मुस्लिम एकता वाला होता है। सिंगार, बिछौर, नई सहित कई गांव ऐसे हैं जहां दोनों आबादी अच्छे से होली में रंग में रंग जाती है। हालांकि अब पिछले कुछ सालों में फर्क जरूर पड़ा है। लेकिन होली पर कोई बुरा नहीं मानता। एक जमाना ऐसा था जब मेवात के मुसलमान और हिंदू मिलकर ढोल नगाड़े की ताल पर रात भर होली के रसिया और चौपाइयों का मजा लेते थे। पिनगवां कस्बा की होली तो मानों मुसलमानों के बगैर अधूरी थी।