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जीएनसीटीडी संशोधित कानून को रद्द करने की मांग पर केंद्र से जवाब तलब

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नई दिल्ली। हाईकोर्ट ने उपराज्यपाल की शक्तियों को बढ़ाने वाले राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (जीएनसीटीडी) संशोधित कानून को रद करने की मांग को लेकर दायर याचिका पर केंद्र सरकार व उपराज्यपाल से जवाब मांगा है। संशोधित अधिनियम के तहत उपराज्यपाल की शक्तियां को असीमित कर दिया गया है।
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मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और न्यायमूर्ति ज्योति सिंह की खंडपीठ ने केन्द्रीय गृह मंत्रालय और उप राज्यपाल कार्यालय को इस मुद्दे पर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है। दिल्ली सरकार ने निर्वाचित सरकार को पक्षकार नहीं बनाने पर सवाल उठाते हुए याचिका को आधारहीन बताया है। सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार के स्थायी वकील संतोष के. त्रिपाठी ने कहा कि याचिका पर सुनवाई नहीं की जा सकती क्योंकि इसमें निर्वाचित सरकार को पक्ष नहीं बनाया गया है।
याची अधिवक्ता की ओर से पेश अधिवक्ता ने कहा कि यह कानून लोगों में भ्रम पैदा करेगा कि राष्ट्रीय राजधानी के लिए फैसला कौन करेगा। याचिकाकर्ता ने कहा कि उपराज्यपाल में शक्तियों के निहित होना सरकार की गणतंत्र प्रणाली के अनुरूप नहीं होगा। उपराज्यपाल के पास पहले से ही भूमि, पुलिस और सेवाओं के मामले में अधिक शक्तियां हैं। अब नए संशोधन से उनके पास दिल्ली विधानसभा द्वारा पारित सभी कानूनों पर अधिकार दिया गया है।
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याची ने कहा कि लोकतंत्र में जनता द्वारा चुनी गई सरकार को ही जनता के हित में निर्णय लेने का अधिकार है। सरकार ही जनता के प्रति जवाबदेही होती है। उपराज्यपाल को मनोनीत किया जाता है। ऐेसे में वे जनता के प्रति पूरी तरह से जवाबदेह नहीं होते। उन्होंने कहा कि यह निर्णय राजनीति से प्रेरित है। याची ने आग्रह किया कि 27 अप्रैल को लागू हुए संशोधित कानून को असंवैधानिक घोषित कर रद किया जाए।
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