भ्रूण को गिराने की हाईकोर्ट ने दी मंजूरी
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हाई कोर्ट ने एम्स की रिपोर्ट के आधार पर 28 सप्ताह की गर्भावस्था को राहत प्रदान करते हुए उसे अपने भ्रूण को गिराने की मंजूरी प्रदान कर दी। एम्स के मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में महिला के तर्को पर सहमति जताते हुए अदालत को बताया कि याची के पेट में पल रहा भ्रूण एन्सेफली से ग्रस्त है। ऐसी स्थिति में खोपड़ी की हड्डी नहीं बनती। ऐसे में उसका जीवित रहना संभव नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश डी एन पटेल और न्यायमूर्ति ज्योति सिंह की पीठ ने याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि वे मामले में विस्तृत निर्णय बाद में देंगे। महिला ने याचिका में तर्क रखा कि 27 सप्ताह 5 दिनों की गर्भावधि के दौरान अल्ट्रासोनोग्राफी करवाने पर पाया गया कि भ्रूण एन्सेफली (खोपड़ी की हड्डी नहीं बनी) से पीड़ित है। ऐसे में जीवन जीना असंभव हो जाता है। उन्होंने कहा कि 1971 के गर्भावस्था अधिनियम के अनुसार गर्भ के 20 सप्ताह के बाद भ्रूण के गर्भपात पर प्रतिबंध है। उन्होंने कहा कि भ्रूण की स्थिति देखने के बाद उसे भ्रूण को नष्ट करने की इजाजत प्रदान की जाए। उन्होंने कहा इससे पहले भी 20 सप्ताह के ज्यादा अवधि के भ्रूण को गिराने की इजाजत दी गई है।