नई दिल्ली। हाईकोर्ट ने कहा है कि अचल संपत्ति के विवाद में फतवा कोई मायने नहीं रखता और उसकी कोई कानूनी मान्यता नहीं है। संपत्ति विवाद स्थापित कानूनी मानदंडों के आधार पर निपटाया जाएगा। न्यायमूर्ति प्रतिभा मनिंदर सिंह ने यह कहते हुए एक अपील को निपटा दिया जिसमें एक व्यक्ति ने दावा किया था कि उसने यह संपत्ति उस व्यक्ति से खरीदी है जो उसे फतवे के जरिये वर्ष 1971 में मिली थी।
अदालत ने कहा इस मामले में सभी मूलभूत तथ्यों को देखना बाकी है और चूंकि मुकदमा नौ साल से अधिक पुराना है। इसलिए वे निचली अदालत को छह महीने के भीतर मुकदमे का फैसला करने का आदेश देते है। अदालत ने कहा कि इस मामले का फैसला 31 जुलाई, 2021 तक सुनाया जाए। यह संपत्ति दरियागंज की है।
वहीं दूसरे पक्ष ने कहा था कि वह किराएदार है और वह 32 साल से ज्यादा समय से रह रहा है। उसका कोई किराया भी नहीं दे रहा है। संपत्ति की मालकिन एक महिला थी और उसने कहा था कि उसके मरने के बाद संपत्ति का मालिक उसका किराएदार या जो इसमें रह रहा है वह होगा। इस तरह से इस जमीन पर उसका अधिकार है।
याची के अधिवक्ता अर्पित भार्गव ने दावा किया कि महिला के मरने के बाद संपत्ति का अधिकार उसके भतीजे को फतवे के माध्यम से मिला था। भार्गव ने तर्क दिया था कि एक फतवा, वास्तव में पार्टियों के बीच सौहार्दपूर्ण समझौता करने की एक विधि है। ऐसेेेे में फतवा अवैध नहीं है। इसके अलाव जब दूसरे पक्ष ने मान लिया कि वह किराएदार है तो वह मालिक होने का दावा नहीं कर सकता।
अदालत ने उनके तर्कों पर असहमति जताते हुए कहा कि वर्ष 2014 में सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि एक फतवा कानूनी रूप से बाध्यकारी दस्तावेज की आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है। न्यायमूर्ति सिंह ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से स्पष्ट है कि किसी तीसरे पक्ष पर फतवा जारी नहीं किया जा सकता।