कृषि कानूनों को निरस्त करने की मांग पर पिछले आठ महीने से आंदोनरत किसानों के तेवर और मजबूत होते दिख रहे हैं। सरकार से वार्ता के 11 दौर के बाद भी सुलह का कोई रास्ता अब तक नहीं निकल सका है। किसानों ने मांगे पूरी होने तक आंदोलन जारी रखने का दावा किया है तो दूसरी तरफ सरकार भी किसान संसद में होने वाली तमाम गतिविधियों पर पैनी निगाह रख रही है। कोरोना काल में इतने लंबे विरोध का असर किसानों के साथ साथ अन्य वर्गों पर भी पड़ रहा है। सभी को इंतजार है कि दोनों पक्षों के बीच गतिरोध खत्म हो। इससे कृषि और देश की अर्थव्यवस्था एक बार फिर पटरी पर लौटेगी।
संयुक्त किसान मोर्चा के डॉ. दर्शन पाल ने कहा कि पहली बार शांतिपूर्ण तरीके से कोई भी आंदोलन इतने दिन तक चला। किसानों के हितों को दरकिनार कर बनाए गए कानून को निरस्त करने की मांग के समर्थन में सभी वर्ग के लोग शामिल हुए हैं। यह एतिहासिक आंदोलन का रूप ले चुका है। इसमें धर्म, संप्रदाय, क्षेत्र से जाति से उपर उठकर किसानों समेत देश के सभी वर्गों के हितों के लिए हक मांगा जा रहा है। इन कानूनों से कॉरपोरेट्स को फायदा पहुंचाया जा रहा है, जबकि आम लोग पर इसका बोझ और बढ़ेगा। कानूनों की वापसी तक आंदोलन खत्म नहीं होगा।
किसान नेता बलबीर सिंह राजेवाल ने कहा किसानों के आठ महीने के आंदोलन में कई उतार चढ़ाव देखे हैं। मौसम चाहे बारिश, सर्दी या गर्मी का हो, हर मौसम के रंग और विपरीत हालातों में भी किसानों अपनी मांगों के समर्थन में संघर्षरत हैं। सरकार ने किसानों को कभी आंदोलनजीवी तो कभी दूसरे नाम देकर तौहीन की है। इस संघर्ष में 550 से अधिक किसानों की जानें चली गईं, लेकिन उनकी सुध किसी ने नहीं ली। मांगे पूरी होने तक किसानों का आंदोलन जारी रहेगा।
किसान नेता युद्धवीर सिंह ने कहा कि जंतर मंतर पर किसानों की बात पूरे देश में पहुंचा रहे हैं। सरकार ने तीनों कृषि कानूनों को झूठ फैलाया है। तीनों कानून किसानों के लिए आत्मघाती है। आठ महीने हो गए शांतिपूर्ण प्रदर्शन करते हुए सरकार हठधर्मिता पर अड़ी। तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने के बाद ही किसानों का आंदोलन खत्म होगा। लड़ाई चाहे कितनी भी लंबी क्यों न हो, मांगे पूरी होने तक आंदोलन जारी रहेगा।
संयुक्त किसान मोर्चा के लीगल सेल के प्रेम सिंह भंगू ने कहा कि आवश्यक वस्तु अधिनियम में बदलाव से कालाबाजारी को बढ़ावा मिलेगा। इससे महंगाई में बढ़ोतरी होने से देश का सभी वर्ग प्रभावित होगा। आंदोलन में शामिल किसानों को बदनाम करने की कई बार कोशिशें हुईं, लेकिन के दायरे में रहकर किसानों का संघर्ष आगे भी जारी रहेगा।
बूटा सिंह बुर्जगिल ने कहा कि किसानों को जिस नाम से पुकारा गया है, यह उचित नहीं है। अगर अनाज पैदा करने वालों को ऐसे नाम से पुकारा जा रहा है तो उन्हें सोचना चाहिए कि खेतों में पैदा होने वाले अनाज के बजाय हवा खाएं या पानी पीकर जिंदा रहें।