-नोटा की बढ़ती ताकत से छात्र संगठनों की बढ़ी चिंता
-2016 में शुरुआत के बाद कई चुनावों में नोटा को मिले हजारों वोट
रश्मि शर्मा
नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (डूसू) चुनाव में प्रत्याशियों को प्रतिद्वंद्वियों के साथ नोटा से भी पार पाना होगा। 2016 में नोटा की शुरुआत के बाद कई चुनावों में हजारों छात्रों ने इनमें से कोई नहीं का विकल्प चुना। 2025 में चारों पदों पर कुल 23,674 वोट नोटा को मिले थे। इसे देखते हुए संगठनों और प्रत्याशियों ने अधिक मतदान और उपलब्धियों के आधार पर उम्मीदवार चुनने की अपील की है।
डूसू चुनाव में पहली बार 2016 में नोटा का विकल्प दिया गया, जिसमें 17,712 छात्रों ने नोटा बटन दबाया। 2017 में सर्वाधिक 29 हजार नोटा वोट पड़े, जो अब तक का रिकॉर्ड है। 2018 में 27,729 और 2019 में 27,576 वोट नोटा के खाते में गए। कोरोना के कारण 2020 से 2022 तक चुनाव नहीं हुए। 2023 में नोटा वोट घटकर 16,565 रह गए, लेकिन 2024 में 20,748 और 2025 में 23,674 वोट मिले।
नोटा के बढ़ते इस्तेमाल का नुकसान आइसा और एनएसयूआई को हो रहा है, क्योंकि एबीवीपी को कैडर वोट मिल जाता है। छात्र राजनीति में हिंसा, धन और बाहुबल को नोटा बढ़ने की वजह माना जाता है। वहीं, करीब बीस सालों से मतदान प्रतिशत 50 प्रतिशत से ऊपर नहीं रहा है। कॉलेज छात्रों से लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी बढ़ाने की अपील कर रहे हैं।