11 जनवरी को गूगल जूम के जरिए एक मिटिंग हुई जिसमें दिशा, निकिता, शांतनु और एमओ धालीवाल समेत करीब 70 लोगों ने भाग लिया। इसमें तय किया गया कि किसान आंदोलन के जरिये देश के माहौल को खराब किया जाए। इसके बाद टूलकिट गूगल डोकोमेंट को तैयार कर दिया गया। बाद में इसे सोशल मीडिया पर पोस्ट भी कर दिया गया। 26 जनवरी के बाद स्वीडन की क्लाइमेट एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग ने दिशा रवि के कहने पर टूलकिट को पोस्ट कर दिया।
चार फरवरी को मामला जब संज्ञान में आया तो आरोपियों ने इसके सबूत नष्ट करना शुरू कर दिए। दिशा ने व्हाटऐप ग्रुप डिलीट कर दिया। लेकिन पुलिस ने धीरे-धीरे इनके खिलाफ सबूत जुटा लिए। पुलिस ने मामले से जुड़े डिजीटल फुटप्रिंट जुटाए हैं। इसमें शांतनु का एक ई-मेल भी शामिल है, जिसमें टूलकिट का जिक्र किया गया है।
तमाम जानकारियां जुटाने के बाद पुलिस ने पेशे से वकील निकिता के घर की तलाशी के लिए नौ फरवरी को सर्च की अनुमति ली। 11 फरवरी को एक टीम मुंबई स्थित निकिता के घर पहुंची। वहां से पुलिस ने दो लैपटॉप और एक आईफोन बरामद किया।
चूंकि टीम शाम को पहुंची थी, इसलिए निकिता से पूछताछ नहीं हुई। उससे पूछताछ में शामिल होने के लिए कुछ दस्तावेज पर साइन करवाए गए। लेकिन अगले ही दिन निकिता फरार हो गई। शांतनु भी अपने घर से फरार है। पुलिस की कई टीमें इनकी तलाश में जुटी हैं।
योग व चाय पर निशाना
टूलकिट मामले की जांच के दौरान खुलासा हुआ है कि भारतीय संस्कृति के अलावा योग, चाय और विदेशों में भारतीय दूतावास को निशाना बनाने की बात की गई थी। योजना के तहत किसानों के समर्थन में लोग भारतीय दूतावासों का घेराव कर वहां हंगामा करें।