पिछले शैक्षणिक सत्र से ही स्कूलों का नियमित संचालन नहीं हो रहा है। बच्चे घर बैठे ऑनलाइन क्लास में ही व्यस्त हैं। होमवर्क से लेकर परीक्षा तक सब कुछ ऑनलाइन है। बावजूद इसके न तो स्कूल फीस ही कम हुई है, और न ही फीस देने के लिए बच्चों के अभिभावकों पर दबाव। यह स्थिति तब है जब कोरोना महामारी के दौर में ज्यादातर लोगों की जेब ढीली पड़ी है।
हालांकि यही स्थिति स्कूल के शिक्षकों की भी है। उन्हें भी कोरोना योद्धाओं की तरह ही ऑनलाइन क्लास लेनी पड़ रही है और नौकरी छूटने का भी डर सता रहा है। उधर, स्टेशनरी के तो दाम नहीं बढ़े हैं लेकिन स्कूलों से किताब व कॉपी की भारी सूची भी अभिभावकों के लिए परेशानी का सबब बनी हुई है।
ज्यादातर स्कूलों के फीस में कटौती नहीं
कोरोना काल में जब सब कुछ बंद है। इन दिनों गर्मी की छुट्टियां भी हैं। बावजूद स्कूल फीस का दबाव अभिभावकों पर बना हुआ है। हर महीने अभिभावकों के मोबाइल पर स्कूल फीस भरने का मैसेज आ जाता है। पिछले दिनों जब स्कूलों की छुट्टी नहीं थी तो कई बार ऑनलाइन क्लास के वक्त बच्चों पर भी फीस जमा करने के बारे में कहने से स्कूल प्रशासन पीछे नहीं थे।
अभिभावक अनामिका का कहना है कि जब स्कूल एक साल से बंद है। ऑनलाइन ही पढ़ाई हो रही तो पूरी फीस लेने की कोई वजह नहीं है। हर महीने अलग-अलग मद में फीस के अलावा भी चार्ज वसूले जाते हैं। इसी तरह एक अन्य अभिभावक डिंपी आर्या का कहना है कि कोविड के दौर में लोगों का व्यवसाय खत्म हो रहा है, नौकरियां छूट रही हैं, लोग घरों में कैद हैं। ऐसी स्थिति में स्कूल फीस भी एक तरह से मानसिक दबाव पैदा करती है। सरकार को इस तरफ ध्यान देना चाहिए।
कॉपी-किताब लेने के लिए भी बना रहे थे दबाव
हर स्कूल का अपना सिलेबस व अपना किताब चलती है। यहां तक कि होमवर्क के लिए कॉपी भी संबंधित स्कूलों से ही लेने की मजबूरी अभिभावकों की है। एक तो स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली किताब आम दुकानों पर नहीं मिलती। लिहाजा स्कूल के बताए गए केंद्र से ही अभिभावकों को किताब व होमवर्क की कॉपी लेने की मजबूरी है। इतना ही नहीं बड़े से बड़े पब्लिशर्स जहां किताबों पर 10 से 30 प्रतिशत की छूट देते है। वहीं बच्चों की किताब प्रिंट रेट पर ही बिक्री स्कूलों के माध्यम से की जाती है। कई स्कूलों में तो 50 पेज की कॉपी 150 रुपये से नीचे की नहीं है।
स्टेशनरी तो महंगी नहीं हुई लेकिन स्कूलों में जरूर हुई महंगी
स्टेशनरी कॉपी-किताब तो ज्यादा महंगा नहीं हुई है, लेकिन स्कूलों में जरूर महंगी हो गई है। दुकानों पर 80 रुपये में बिकने वाली कॉपी 150 रुपये में तो कई स्कूलों में तो 400 रुपये में दी जाती है। स्टेशनरी विक्रेताओं का कहना है कि चार गुणा अधिक स्कूल वाले बच्चों से वसूलते हैं।
हर साल पब्लिशर बदल मोटी रकम कमाते हैं
अमेरिका में अगली क्लास में जाने पर बच्चे अपना किताब स्कूल में छोड़ देते हैं ताकि अन्य बच्चे पढ़ सकें। भारत में तो हर साल पब्लिशर्स ही बदल दिए जाते हैं। क्या हमारी संस्कृति और संविधान बदलता रहता है। ताकि एक बच्चा दूसरे बच्चे की किताबों को नहीं पढ़ सके और मजबूरन उसे स्कूल से किताब खरीदना पड़े। एक रजिस्टर जो डेढ़ सौ में बिकता है उसे स्कूल में 400 रुपये में दिया जाता है। होना यह चाहिए कि पब्लिसर्स पांच साल तक नहीं बदले। ओपन मार्केट में किताब मिलनी चाहिए। स्कूल पढ़ाने की संस्था है माल बेचने की संस्था नहीं है। स्कूल वाले कभी भी बिल नहीं देते। जीएसटी नंबर नहीं होता। इनकम टैक्स नहीं होता है। बिक्री तो करते हैं लेकिन जीएसटी नहीं देते हैं।
- पवन कुमार शर्मा, समाजसेवी
एनसीआरटी की किताबें प्राइवेट पब्लिशर से कम नहीं
मोटी रकम वसूलने के लिए हर साल नई किताब का प्रचलन है। हर साल पब्लिशर बदल जाते हैं। अगर कोई मां पढ़ी-लिखी भी है तो उसे अपने बच्चों को पढ़ाने में कठिनाई होती है, क्योंकि हर बार सिलेबस ही बदल जाता है। एनसीआरटी की किताब जो पढ़ता है वह भी देश का बच्चा है। क्या प्राइवेट पब्लिसर्स ज्यादा ज्ञान दे देते हैं। कोई सुनने वाला नहीं है। छोटा बच्चा एक्टिविटी का क्या करेगा, उस एक्टिविटी का भी पैसा स्कूल वाले वसूल लेते हैं।
विनिता शर्मा, गृहणी
स्कूल की भी कुछ मजबूरी है। लॉकडाउन में सभी सोचते हैं कि घर बैठे वेतन मिल जाए। स्कूल के शिक्षकों को भी उम्मीद रहती है कि उन्हें उनका वेतन मिलता रहे। इसके लिए फीस भी जरूरी है। हालांकि कोरोना की वजह से कई अभिभावकों की भी नौकरी छूट गई है। सैलरी भी आधी मिल रही है। ऐसे में स्कूल प्रशासन को भी वर्तमान परिस्थिति को समझना चाहिए।
मधुलिका गुप्ता, गृहणी व समाजसेवी
इन दिनों स्कूल वाले पढ़ाई के साथ ही एक्टिविटी क्लास भी लेते हैं। कोराना की वजह से जब सब परेशान हैं। इस बीच शिक्षक कम से कम बच्चों को एक्टिविटी करा कर खुश रख रहे हैं। कई स्कूल की शिक्षिका भी बच्चों को परेशानी के दौर में पॉजिटिव ऊर्जा भरती हैं।
- प्रीति सिंह, अभिभावक