हौसला रखो मम्मा, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती है। मन में विश्वास रखो, हम होंगे कामयाब और कोरोना को देंगे मात। आप चिंता मत करो, दोनों छोटे भाइयों को मैं घर पर रह कर संभाल लूंगी। आप अपनी पूरी जांच करा कर जांच सेंटर से आओ। बेटी के इसी विश्वास से 15 दिनों से कोरोना संक्रमण की चपेट में रही वंदना चावला को जीत की प्रेरणा मिलती रही। आज वह परिवार के साथ स्वस्थ हैं।
कोरोना की जंग में बेटियों का हिम्मत बढ़ाना और परिवार की जिम्मेदारी संभालना भी बड़ा संबल बना हुआ है। मुखर्जी नगर की वंदना चावला जब तेज बुखार, सर्दी-खांसी की चपेट में आईं तो उनकी चौथी क्लास में पढ़ने वाली नौ साल की बेटी वंशिका ने हौसला बुलंद रखा। यहां तक कि अपनी मां को छोटे भाइयों की जिम्मेदारी से मुक्त कर लाई जय और यीशु को नहलाना और खिलाने की जिम्मेदारी भी संभाल ली।
वंदना चावला कहती हैं कि मदर्स डे पर यह मेरे लिए बेटी की तरफ से सबसे बेहतर उपहार रहा जो कभी ना भूलने वाला है। हालांकि, इस बीच उन्हें कभी ना भूलने वाला दर्द भी कोविड-19 ने दिया। चावला कहती हैं कि संक्रमण के दौरान ही सबसे अजीज श्वेता भाभी ने अपने पति को खो दिया। ये ऐसा गम है जो कभी नहीं भूला जा सकता।
बेहद समझदारी से रखा ध्यान
कोरोना फाइटर बनकर उभरी वंदना ने बताया कि शुरू के दस दिन तो बुखार रहा, इस दौरान कोरोनिल, गर्म पानी की भाप, विटामिन सी समेत कई दवाएं लेती रहीं। जब ठीक नहीं हुआ तो दोबारा जांच में कोरोना पॉजिटिव आया। तब पड़ोस में रहने वाले डॉ. सुमन अचानक से फरिश्ता बनकर आए और उन्होंने इलाज शुरू किया। अब पति और तीनों बच्चों के साथ स्वस्थ हूं। गर्म पानी पीना, खाने में ध्यान देना और परिवार के सदस्यों के साथ घर में ही रहती हूं।
शिक्षिका कहती हैं कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती: वंशिका चावला
वंशिका का कहना है कि कोरोना तो पिछले साल भी आया था। तब तो कुछ भी नहीं हुआ। इसी का अहसास मुझे था और विश्वास भी था कि मम्मा का कोरोना संक्रमण कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएगा। मेरी मम्मा सबसे प्यारी है और मेरे पापा व छोटे भाई। अप्राजिता मैम बार-बार कहती है कि कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।