हाईकोर्ट ने डॉक्टरों, नर्सों और स्वच्छता कर्मचारियों के वेतन का भुगतान न करने पर तीनों एमसीडी को आड़े हाथ लिया। अदालत ने चेतावनी देते हुए कहा कि लॉर्ड की तरह जी रहे पार्षदों एवं वरिष्ठ अधिकारियों समेत तीनों नगर निगमों के सभी गैर जरूरी एवं विवेकाधीन व्ययों को रोका जाएगा ताकि डॉक्टरों, नर्सों एवं सफाईकर्मियों समेत कोविड-19 के अग्रिम मोर्चा कर्मियों के वेतन एवं पेंशन का भुगतान किया जा सके।
न्यायमूर्ति विपिन सांघी व न्यायमूर्ति रेखा पिल्लई की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि कोविड-19 में फ्रंट लाइन के रूप में काम कर रहे डॉक्टर, नर्स और स्वच्छता कर्मचारियों को वेतन का भुगतान नहीं किया जा रहा। यह दुर्भाग्य पूर्ण है। अदालत ने तीनों एमसीडी को उच्च अधिकारियों पर किए जा रहे खर्चो का पूरा विवरण पेश करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि यदि वेतन में कटौती की जानी है तो पार्षदों व अधिकारियों से इसकी शुरुआत की जानी चाहिए।
अदालत ने कहा कि कोविड-19 महामारी के दौरान अग्रिम मोर्चे पर काम करने वाले डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ व अन्य के वेतन का भुगतान को विवेकाधीन खर्चों पर प्राथमिकता देनी चाहिए।
अदालत ने कहा कि शीर्ष पदो पर आसीन लोग राजाओं की तरह रह रहे हैं। एक बार उन्हें तकलीफ महसूस हो जाएगी तो चीजें अपने आप काम करने लगेंगी। तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के कर्मी ही क्यों परेशान हों? अदालत ने कहा कि वेतन एवं पेंशन के गैर-भुगतान के लिए धनाभाव का बहाना नहीं चल सकता है क्योंकि संविधान के तहत ये उनके मौलिक अधिकार हैं।
सही समय पर भुगतान न होने पर हकदार व्यक्तियों के जीवन और जीवन की गुणवत्ता पर असर पड़ता है। अदालत ने कहा फंड के न होने का तर्क नहीं माना जा सकता। खंडपीठ ने एमसीडी के उस तर्क को खारिज कर दिया कि दिल्ली सरकार द्वारा निगमों को दिये गये पैसे में ऋण की राशि काट की है। इतना ही नहीं भारतीय रिजर्व बैंक ने ऋण अदायगी और बैंकों एवं वित्तीय संस्थानों द्वारा खातों को गैर निष्पादित संपत्तियां घोषित करने पर रोक लगा दी है। अदालत इन तीनों निगमों के शिक्षकों, डॉक्टरों और सफाईकर्मियों समेत सेवारत एवं सेवानिवृत कर्मियों को वेन एवं पेंशन का भुगतान नहीं किये जाने संबंधी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।
दिल्ली सरकार के अतिरिक्त स्थायी वकील सत्यकाम ने अदालत से आग्रह किया कि उन्हें यह निर्देश लेने का समय दिया जाए कि कटौती क्यों उचित है । अदालत ने दिल्ली सरकार को यह बताने के लिए 21 जनवरी तक का समय दिया है कि प्रचलित महामारी के दौरान कटौती क्यों नहीं रोकी गई जब सभी को किसी प्रकार की वित्तीय हानि हुई हो। अदालत ने मामले की सुनवाई 21 जनवरी तय की है।