कोरोना वायरस की वजह से रेमडेसिविर इंजेक्शन को अब हर कोई जानने लगा है। हालात यह हैं कि मरीजों के परिजन इंजेक्शन के लिए अस्पताल की पर्ची लेकर कभी दिल्ली तो कभी नोएडा-गाजियाबाद यहां तक कि मुंबई और हैदराबाद तक चक्कर लगा रहे हैं। वहीं कालाबाजारी इस कदर बढ़ चुकी है कि एक इंजेक्शन 30 से 50 हजार रुपये तक की कीमत में मिल रहा है। दिल्ली से सटे हरियाणा और उत्तर प्रदेश के शहरों में लगभग एक जैसा हाल है। अमर उजाला ने जमीनी स्तर पर जाकर इस मारामारी के पीछे कारणों का पता लगाया तो हकीकत कुछ और ही सामने आई।
दरअसल देश में रेमडेसिविर इंजेक्शन के उत्पादन की कमी नहीं है। हर महीने 38 लाख से ज्यादा इंजेक्शन बनते आ रहे हैं। अब तो सरकारों ने भी इसे अपने नियंत्रण में ले लिया है लेकिन इसके बाद भी तीमारदारों को यह इंजेक्शन नहीं मिल रहा है। पड़ताल के दौरान हालात ऐसे मिले कि अस्पताल से एक पर्ची तीमारदार को यह कहकर दी जाती है कि मरीज की हालत गंभीर है, इस इंजेक्शन की जल्द से जल्द जुगाड़ कर लो।
इसके बाद तीमारदार चारों तरफ धक्के खाता है और मदद मांगता है लेकिन उसे इंजेक्शन नहीं मिलता। यह स्थिति तब है जब सरकार ने इंजेक्शन को नियंत्रण में लेते हुए नियम बनाया है कि एक अस्पताल से संबंधित जिला प्रशासन के पास रेमडेसिविर इंजेक्शन की मांग पहुंचेगी और फिर वहां से वितरक के पास एक पत्र जाएगा जिसके आधार पर इंजेक्शन दिया जाएगा लेकिन अस्पताल और प्रशासन किसी को अपनी जिम्मेदारी का एहसास नहीं है।
इंजेक्शन की कमी आज भी नहीं
रेमडेसिविर का उत्पादन प्रति माह 38 लाख हो रहा था जो कि इसी महीने में 45 लाख पार कर चुका है। पहले देश की आठ कंपनी जाइडस कैडिला, सिपला, हैक्ट्रो इत्यादि इंजेक्शन बना रही थीं अब 21 और कंपनियों को लाइसेंस मिल चुका है। इससे पता चलता है कि देश में इंजेक्शन उत्पादन की कमी बिलकुल भी नहीं है।
10 फीसदी से ज्यादा मांग मतलब प्रैक्टिस गलत
नीति आयोग के सदस्य डॉ वीके पॉल का कहना है कि रेमडेसिविर इंजेक्शन आमतौर पर दो से तीन फीसदी मरीजों में ही दिया जा सकता है। वर्तमान माहौल देखें तो एक जिले में कुल सक्रिय मरीजों के 10 फीसदी तक को इंजेक्शन दे सकते हैं। अगर इससे अधिक मांग हो रही है तो इसका मतलब उक्त जिले या राज्य में गलत प्रैक्टिस को बढ़ावा मिल रहा है।
मौत से नहीं रोक पाएगा रेमडेसिविर
आईसीएमआर के पूर्व संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉ. आर गंगाखेड़कर ने कहा कि पिछले वर्ष अप्रैल माह में ही कोरोना वायरस के उपचार में रेमडेसिविर को लेकर चीन ने सबसे पहले अध्ययन किया था। इससे पहले तक दक्षिण अफ्रीका में इबोला के लिए इस्तेमाल हुआ लेकिन चीन के बाद अमेरिका और अन्य देशों में अध्ययन हुआ। सभी जगह परिणाम यही आया कि इस इंजेक्शन से किसी मरीज की मौत को नहीं रोका जा सकता।
प्राइवेट अस्पतालों में मांग सबसे ज्यादा क्यों?
दिल्ली और एनसीआर में इंजेक्शन के लिए घूम रहे ज्यादातर तीमारदारों के मरीज यहां के प्राइवेट अस्पतालों में भर्ती हैं। यहां के डॉक्टर आईसीयू में हाई प्रेशर पर मौजूद मरीज या फिर वेंटिलेटर पर मौजूद मरीज पर खुलेआम परीक्षण कर रहे हैं। एक ही मरीज के लिए टोसिलिजुमैब, प्लाज्मा, रेमडेसिविर, डेक्थामेथासोन, फेविपिराविर (फेवि फ्लू) जैसी सभी दवाएं तक दे रहे हैं। जबकि यह उन्हें भी पता है कि इनमें से एक भी दवा अब तक असरदार साबित नहीं हुई है। इसकी पुष्टि एम्स के निदेशक भी कर चुके हैं।
तीमारदारों को भी जागरूक होने की जरूरत
दिल्ली एम्स के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया का कहना है कि कोविड प्रोटोकॉल में रेमडेसिविर इंजेक्शन है तो और भी उसके समान असर वाली दवाएं हैं। सभी का अब तक ठोस असर पता नहीं चला है लेकिन अगर हमारे पास कोई दवा उपलब्ध नहीं है तो हम उसके वैकल्पिक दवाओं को दे सकते हैं। जरूरी नहीं है कि तीमारदार रेमडेसिविर या टोसिलिजुमैब के लिए इधर उधर भटकता रहे।