हाईकोर्ट ने कहा कोई भी कानून पति को अपनी पत्नी को पीटने और प्रताड़ित करने का अधिकार नहीं देता। अदालत ने पुरुष द्वारा क्रूरता और परित्याग के आधार पर एक महिला को तलाक देते हुए यह टिप्पणी की। न्यायमूर्ति सुरेश कुमार कैत और नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने कहा, प्रतिवादी का ऐसा आचरण आवश्यक रूप से शारीरिक क्रूरता के रूप में योग्य है, जो अपीलकर्ता (महिला) को हिंदू विवाह अधिनियम (एचएमए), 1955 की धारा 13 (1) (आईए) के तहत तलाक का अधिकार देता है।
अदालत ने कहा कि फैसला सुनाए जाने के समय जो व्यक्ति अदालत में मौजूद था, उसे तलाक दिए जाने पर कोई आपत्ति नहीं थी। पीठ महिला द्वारा दायर एक अपील पर सुनवाई कर रठी थी जिसमें एक पारिवारिक अदालत के फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसने क्रूरता और परित्याग के आधार पर पुरुष से तलाक की मांग करने वाली उसकी याचिका को खारिज कर दिया था।
उच्च न्यायालय ने कहा कि महिला ने बताया था कि 11 मई, 2013 को उसे घायल हालत में उसके माता-पिता के घर छोड़ दिया गया था और उसके बाद उसके प्रयासों के बावजूद पुरुष ने उसे वैवाहिक घर में वापस ले जाने से इनकार कर दिया। पीठ ने कहा कि प्रतिवादी का वैवाहिक संबंध फिर से शुरू करने का कोई इरादा नहीं है जो तब भी परिलक्षित हुआ जब उसने याचिका का विरोध नहीं करने का फैसला किया।
महिला की याचिका के अनुसार उसकी और उस व्यक्ति की शादी फरवरी 2013 में हुई थी और वे उस व्यक्ति की मौसी के परिवार के साथ रह रहे हैं क्योंकि उसके माता-पिता की काफी समय पहले मृत्यु हो गई थी। महिला ने दावा किया कि शादी के तुरंत बाद उसे शारीरिक और मानसिक यातनाएं दी गईं और उस पर तरह-तरह के अत्याचार किए गए, जिन्हें वह इस उम्मीद में सहती रही कि समय बीतने के साथ चीजें ठीक हो जाएंगी।