हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार की उस अधिसूचना को सही ठहराया है जिसमें कहा गया है कि कनिष्ठता वरिष्ठता को छोड़कर सभी डॉक्टर व विशेषज्ञ तथा कर्मचारी कोरोना मरीजों का इलाज सेवा भावना से करें। यह अधिसूचना 16 मई को जारी किया गया था, जिसे एक डॉक्टर ने चुनौती दी है।
न्यायमूर्ति रेखा पल्ली ने सुनवाई के दौरान कहा कि इस अधिसूचना में क्या इगो प्रॉब्लम है। यह सिर्फ कोरोना के इलाज को लेकर है ना कि सामान्य। इसमें दिक्कत क्या है। उन्होंने कहा कि 16 मई की अधिसूचना में क्या खराबी है। मैं एक डॉक्टर से इस तरह की उम्मीद नहीं करती हूं कि इस प्रकार से मामले को अदालत में लाया जाए। उन्होंने कहा प्रथम दृष्टया में आदेश में कुछ भी गलत नजर नहीं आ रहा। अदालत ने इस मामले की सुनवाई 27 मई के लिए स्थगित कर दी।
जीटीबी अस्पताल में कार्यरत्त याची डॉक्टर ने कहा यह मनमाना निर्णय है और 27 अप्रैल से लागू हुए संशोधित जीएनसीटीडी अधिनियम के तहत आवश्यक उपराज्यपाल की मंजूरी के बिना जारी किया गया है। ऐसे में उसे निरस्त कर दिया जाए।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता पायल बहल ने कहा कि यह अधिसूचना भेदभाव पूर्ण है जिसमें एलोपैथिक, आयुर्वेदिक वरिष्ठ व कनिष्ठ डॉक्टरों को एक समान माना गया है। कनिष्ठ डॉक्टर कोरोना मरीज का इलाज उस तरह से नहीं कर सकते जिस तरह से वरिष्ठ डॉक्टर करते हैं। कनिष्ठ डॉक्टरों के इलाज करने से मरीज के जान को खतरा हो सकता है।
याचिकाकर्ता डॉक्टर ने कहा था कि इससे प्रशासनिक व्यवस्था चरमरा जाएगी और उसका असर नकारात्मक पड़ेगा। इस तरह की अधिसूचना जारी करने का अधिकार दिल्ली सरकार के न स्वास्थ्य मंत्री और ना ही स्वस्थ सचिव को है।
सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार के अधिवक्ता अनुज अग्रवाल ने कहा कि इस अधिसूचना को जारी करने का उद्देश् मात्र सभी को समान मानकर कोविड महामारी से मिलकर लड़ने का है। फिलहाल वे संबंधित अथारिटी से बात कर पक्ष रखेंगे।