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दिल्ली हाईकोर्ट: प्राइवेट जासूसों और उनकी एजेंसियों की गतिविधियों के नियमन की मांग संबंधी याचिका पर दिशा निर्देश से इनकार

Wed, 23 Mar 2022 10:57 AM IST
अनुराग सक्सेना अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली

सार

कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी और न्यायमूर्ति नवीन चावला की खंडपीठ ने याचिका का निपटारा करते हुए केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह जांच करे कि क्या निजी पहचान की गतिविधि के नियमन के लिए कानून बनाना संभव है।
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दिल्ली हाईकोर्ट - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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हाईकोर्ट ने प्राइवेट जासूसों और उनकी एजेंसियों की गतिविधियों के नियमन की मांग संबंधी याचिका पर दिशा निर्देश जारी करने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि अदालत कानून नहीं बना सकती है। इस संबंध में कोई आदेश जारी नहीं किया जा सकता।

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कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी और न्यायमूर्ति नवीन चावला की खंडपीठ ने याचिका का निपटारा करते हुए केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह याचिका पर एक प्रतिनिधित्व के रूप में विचार करे और इस पहलू की जांच करे कि क्या निजी पहचान की गतिविधि के नियमन के लिए कानून बनाना संभव है।

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अधिवक्ता प्रीति सिंह के माध्यम से दायर याचिका में कहा गया कि प्राइवेट जासूस, जांचकर्ताओं और उनकी एजेंसियों का काम किसी भी मौजूदा वैधानिक ढांचे के दायरे से बाहर है। तर्क दिया गया कि चूंकि निजी जासूसों और उनकी एजेंसियों की गतिविधियों का कोई कानूनी शासन नहीं है, इसलिए कई पीड़ितों के साथ दुर्व्यवहार किया जा रहा है, उन्हें धोखा दिया जा रहा है। इसके अलावा, प्राइवेट जासूसों को उत्तरदायी बनाने के लिए कोई वैधानिक कानून लागू नहीं किया जा सकता।

याचिका में तर्क दिया गया कि जब बिना जवाबदेही के एक प्राइवेट जासूस का काम किया जाता है तो भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत नागरिक के मौलिक अधिकारों के लिए खतरा है। याचिकाकर्ता ने खुद को अपने पति द्वारा नियुक्त प्राइवेट जासूस की अनियमि त गतिविधियों का शिकार होने का दावा किया। इससे उसकी निजता का उल्लंघन हुआ और उसे सार्वजनिक रूप से बदनाम किया गया।

सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि सरकार ने संसद में 2007 का एक प्राइवेट डिटेक्टिव्स एजेंसी (विनियमन) विधेयक पेश किया था। हालांकि इसे 23 मार्च 2020 को वापस ले लिया गया।
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