केंद्र व दिल्ली सरकार के बीच आक्सीजन को लेकर सियासी घमासान मचा हुआ है। दिल्ली में पीएसए (प्रेशर स्विंग एडसार्पशन ) प्लांट न लगाने के केंद्र के आरोपों को दिल्ली सरकार ने बेबुनियाद बताया है। सरकार का कहना है कि प्लांट लगाने के लिए केंद्र ने दिल्ली को कोई राशि उपलब्ध नहीं कराई है। साथ ही इस कार्य के लिए केंद्र सरकार की ओर से एक ही ठेकेदार तय किया गया था, जिसने सिर्फ एक प्लांट का काम ही शुरू किया था।
दिल्ली सरकार के मुताबिक, केंद्र की ओर से दिल्ली सरकार को प्लांट लगाने के लिए कोई धन राशि नहीं दी गई है। पीएम फंड से सारा पैसा केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को दिया था और प्लांट लगाने कि जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इसके बाद स्वास्थ्य मंत्रालय ने दिल्ली सरकार से जमीन मांगी। आठ अस्पतालों के अंदर दिल्ली सरकार की तरफ से जमीन उपलब्ध करवा दी गई। लेकिन मंत्रालय की तरफ से ऑक्जीसन प्लांट बनाने का ठेका सिर्फ एक ठेकेदार को दिया गया है। ठेकेदार ने सिर्फ एक प्लांट का निर्माण किया और बाकि को अभी तक नहीं किया। दिल्ली सरकार का कहना है कि सिर्फ एक ठेकेदार के लिए जल्दी ऑक्सीजन प्लांट बनाना संभव नहीं था। इसके कारण पूरे देशभर में अधिकांश ऑक्सीजन प्लांट नहीं बने हैं। जिसकी वजह से ऑक्सीजन की दिक्कत हो रही है।
इससे पहले केंद्रीय स्वास्थ एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के सचिव निपुन विनायक ने ऑक्सीजन संबंध में दिल्ली उच्च न्यायालय में कहा था कि कोरोना महामारी के हालात को देखते हुए दिसंबर 2020 में देश भर में आक्सीजन उत्पादन के लिए पीएसए (प्रेशर स्विंग एडसार्पशन ) प्लांट के लिए फंड जारी किया गया था। इसके तहत दिल्ली में भी आठ पीएसए प्लांट लगाए जाने हैं, लेकिन दिल्ली सरकार ने इसके क्रियान्वयन को लेकर उत्साह नहीं दिखाया। अब तक सिर्फ दो अस्पतालों में पीएसए प्लांट लगाने के लिए साइट क्लीयरेंस मिला है।
इन अस्पतालों में लगाए जाने थे प्लांट
पीएम केयर फंड के जरिए दिल्ली के आठ अस्पतालों में पीएसए का ढांचा विकसित करना था। जानकारी के मुताबिक, दीप चंद बंधू अस्पताल, दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल, डॉ. बीएसए अस्पताल, बुराड़ी अस्पताल, लोक नायक अस्पताल, अंबेडकर अस्पताल, जीटीबी अस्पताल में ऑक्सीजन प्लांट बनाने थे। इनकी क्षमता करीब 5700 बेड तक ऑक्सीजन पहुंचाने की होती।
क्या है पीएसए प्लांट
इसके प्लांट के जरिये वातावरण में मौजूद हवा को सोखकर उसमें मौजूद गंदगी को साफ किया जाता है। इसके बाद जियोलाइट केमिकल के जरिये नाइट्रोजन व आक्सीजन को पृथक किया जाता है। नाइट्रोजन को वापस वातावरण में छोड़ दिया जाता है, जबकि आक्सीजन को पाइपलाइन के जरिये सीधे मरीजों तक पहुंचाया जा सकता है।