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उपहार सिनेमा अग्निकांड: दोषी अंसल बंधुओं को राहत नहीं, अदालत का सजा निलंबित करने से इनकार, सभी को जेल में ही रहना होगा

Fri, 03 Dec 2021 05:38 PM IST
सुशील कुमार अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली

सार

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि दोषियों ने अदालत की फाइल से दस्तावेज गायब व छेड़छाड कर न्यायपालिका से खिलवाड़ किया है। उन्होंने पैसे के बल पर अदालत के स्टाफ दिनेश चंद शर्मा को अपने साथ मिलाकर पीड़ितों को न्याय पाने से दूर करने का प्रयास किया।
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उपहार अग्निकांड - फोटो : Social Media
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विस्तार
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अदालत ने उपहार सिनेमा अग्निकांड मामले में दोषी अंसल बंधुओं व अन्य को राहत प्रदान करने से इनकार कर दिया। उनकी सजा के खिलाफ अपील के निपटारे तक सजा निलंबित करने से इनकार कर दिया। यानि सभी अब जेल में ही रहेंगे। अदालत ने कहा दोषियों पर गंभीर आरोप है और उनके रवैये को देखते हुए सजा निलंबन का कोई आधार नहीं है। अदालत ने उनकी अपील पर सुनवाई 23 फरवरी 2022 तय की है।

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अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अनिल अंतिल ने गोपाल अंसल, सुशील अंसल के अलावा अदालत के पूर्व कर्मचारी दिनेश चंद शर्मा और दो अन्य लोगों पीपी बत्रा और अनूप सिंह की मजिस्ट्रेट के फैसले के खिलाफ दायर अपील के निपटारे तक सजा निलंबित करने संबंधी अपील खारिज कर दी।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि दोषियों ने अदालत की फाइल से दस्तावेज गायब व छेड़छाड कर न्यायपालिका से खिलवाड़ किया है। उन्होंने पैसे के बल पर अदालत के स्टाफ दिनेश चंद शर्मा को अपने साथ मिलाकर पीड़ितों को न्याय पाने से दूर करने का प्रयास किया। यह गंभीर मामला है। ऐसे में किसी भी प्रकार की राहत पाने के हकदार नहीं है।
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मजिस्ट्रेट अदालत ने अंसल बंधुओं, अदालत के पूर्व कर्मचारी दिनेश चंद शर्मा और दो अन्य लोगों पीपी बत्रा और अनूप सिंह को सात-सात साल कैद की सजा सुनाते हुए उन पर तीन-तीन लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया था।
अदालत ने अंसल पर 2.25 करोड़ रुपये का जुर्माना भी लगाया था। इन सभी ने स्वयं को निर्दोष बताते हुए अपील की है। अदालत ने मामले में उपहार अग्निकांड पीड़ित एसोसिएशन व पुलिस के उस तर्क को स्वीकार कर लिया कि मामले में अदालती फाइल से मुख्य दस्तावेजों से छेड़छाड करना गंभीर मामला है। यह न्यायिक सिस्टम पर हमला है।
 
अदालत ने सरकारी वकील एटी अंसारी के उस तर्क को भी स्वीकार कर लिया कि पूरा मामला न्यायिक सिस्टम पर आम लोगों के विश्वास व पिछले 24 वर्ष से इंसाफ के लिए लड़ाई लड़ रहे उपहार हादसे से पीड़ितों के विश्वास का है। इन लोगों ने 24 वर्ष न्यायिक सिस्टम पर विश्वास किया और सजा के मात्र 15 दिनों बाद सजा निलंबन से उनका विश्वास टूट जाएगा।

उन्होंने कहा था निचली अदालत के फैसले से स्पष्ट है कि अंसल व अन्य ने एक षडयंत्र रच कर अदालती स्टाफ दिनेश चंद शर्मा से मिलकर मूल दस्तावेजों से छेड़छाड़ की और दस्तावेज गायब कर दिए। उन्होंने कहा दोषियों ने न्यायिक सिस्टम से खिलवाड़ किया है और उनको उसकी सजा मिली है। सजा निलंबन से आम लोगों का विश्वास न्यायिक सिस्टम से कम होगा।

उन्होंने कहा कि अंसल बंधुओं ने पैसे के बल पर सिस्टम से खिलवाड़ किया है और उनको कड़ी सजा मिलनी ही चाहिए थी। उनकी अपील के निपटारे तक सजा का निलंबन को कोई आधार नहीं है। 

न्यायपालिका पर पुन: विश्वास कायम- नीलम कृष्णमूर्ति
उपहार पीड़ित एसोसिएशन की अध्यक्ष नीलम कृष्ण मूर्ति ने फैसले पर खुशी जताई है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2015 में जिस प्रकार अदालत ने अंसल व अन्य पर जुर्माना लगा कर छोड़ दिया था उसने उनका न्यायपालिका से विश्वास उठ गया था लेकिन आज के निर्णय के बाद उनका न्यायपालिका पर विश्वास पुन: कायम हुआ है। उन्होंने कहा आज के फैसले से उनको कड़ा संदेश मिलेगा कि पैसे के बल पर वे साक्ष्यों से छेडछाड़ कर न्याय से खिलवाड़ नहीं कर सकते। इससे आम लोगों का भी न्यायपालिका पर विश्वास बढ़ेगा। आज का फैसला मेरे व मेरे बच्चों के लिए राहत भरा है।

दोषियों के तर्क
सुशील अंसल, गोपाल अंसल, पीपी बत्रा व अदालत के बर्खास्त कर्मचारी दिनेश चंद शर्मा के वकीलों ने निचली अदालत द्वारा उनके मुवक्किलों को सात वर्ष की सुनाई सजा को गलत बताते हुए अपील के निपटारे तक सजा को निलंबित करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि उनके मुवक्किलों का मामले से लेनादेना नहीं है और बिना आधार के ही अदालत ने उनके मुवक्किलों को दोषी मानते हुए सजा सुनाई है।

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दोषियों का जमानत आपराधिक कानून के स्थापित सिद्धांतों के खिलाफ

अदालत ने न्यायिक रिकार्ड से छेड़छाड़ के मामले को अत्यंत गंभीर प्रकृति का माना है। अदालत ने कहा यदि ऐसे मामलों में दोषियों की सजा निलंबित कर उनको जमानत प्रदान की जाती है तो यह न केवल आपराधिक कानून के स्थापित सिद्धांतों के खिलाफ है बल्कि न्यायिक प्रणाली में आम जनता के विश्वास को हिला देती है। अदालत ने उक्त टिप्पणी उपहार अग्निकांड मामले में साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने के मामले में दोषी अंसल बंधुओं सहित अन्य की अपील के निपटारे तक सजा निलंबित करने से इनकार करते हुए की।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अनिल अंतिल ने अपने 44 पृष्ठों के फैसले में कहा कि  यह कहना गलत होगा कि यदि न्यायपालिका ने एक संस्था के रूप में जनता का विश्वास खोना शुरू कर दिया तो लोकतंत्र का हमारा अर्जित मूल गंभीर खतरे में पड़ जाएगा।

उन्होंने कहा कि मामले की सुनवाई में अत्यधिक देरी भी अपराध के पीड़ितों के लिए तीव्र पीड़ा और पीड़ा का कारण बनती है। पीड़ितों के अधिकार किसी भी मानदंड से अभियुक्तों/दोषियों के अधिकारों के अधीन नहीं हो सकते।

उन्होंने कहा एक आपराधिक न्याय प्रणाली न केवल कानून से अपनी वैधता को संचालित करती है, बल्कि उस विश्वास से भी अधिक होती है जो जनता में बड़े पैमाने पर होती है। अदालत ने कहा इस मामले में अपराध की प्रकृति ऐसी है कि यह अदालत के कामकाज की इमारत पर हमला है। 

अदालत ने कहा उनके हाथ में यह मामला अपनी तरह का सबसे गंभीर मामला है। यह अपराध न्याय की प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने के लिए अपीलकर्ताओं/दोषियों की ओर से एक सुनियोजित योजना का परिणाम प्रतीत होता है। न्यायिक जगत के जजों को संस्था की उदात्तता को बनाए रखने के लिए कोई उदारता नहीं दिखाने की आवश्यकता है, और न्याय के प्रशासन में आम जनता में विश्वास का सहारा लेना चाहिए।

उन्होंने कहा न्याय की प्रक्रिया में किसी भी तरह का हस्तक्षेप, न्याय मांगने वालों के रास्ते में कोई भी रुकावट कानून की मजबूरी का अपमान है और इसे गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। अदालत ने बचाव पक्ष के सभी तर्को को खारिज करते हुए कहा कि उनके वकीलों ने लंबी बहस के दौरान तर्कों के समर्थन में कई निर्णयों का हवाला दिया लेकिन शासन के सिद्धांत अच्छी तरह से स्थापित हैं और एक समान रहते हैं। प्रत्येक मामले का निर्णय अपने स्वयं के अजीबोगरीब तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाता है।
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