सॉलिसिटर जनरल ने गुरुस्वामी के तर्क पर आपत्ति जताते हुए सुनवाई के लिए रोस्टर बदलने का मामला उठाया। खंडपीठ ने केंद्र से रोस्टर के सवाल पर अपना स्पष्टीकरण देने को कहा है। गुरुस्वामी ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने याचिकाओं को इस पीठ के पास सुनवाई के लिए भेजा है। फरवरी में केंद्र ने दिल्ली उच्च न्यायालय को बताया था कि भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत समलैंगिकता को गैरकानूनी घोषित करने के बावजूद समलैंगिक विवाह देश में मौलिक अधिकार नहीं है।
केंद्र सरकार ने यह भी कहा था कि समान लिंग के जोड़े को पार्टनर के रूप में एक साथ रहने और यौन संबंध रखने की तुलना एक 'भारतीय परिवार इकाई' के साथ नहीं की गई। केंद्र सरकार ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अधीन है, और समलैंगिक विवाह न तो मान्यता प्राप्त है और न ही किसी भी अशोधित व्यक्तिगत कानूनों या किसी संहिताबद्ध सांविधिक कानूनों में स्वीकार किए जाते हैं।