केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने 10वीं बोर्ड परीक्षा के रद्द होने के बाद स्कूल द्वारा अंक निर्धारित करने की आंतरिक मूल्यांकन नीति को उचित ठहराया है। सीबीएसई ने कहा यह नीति स्कूल व सीबीएसई के विशेषज्ञों ने तैयार की है और इसमें छात्रों से अन्याय नहीं हो पाएगा।
इतना ही नहीं 12वीं की बोर्ड परीक्षा रद्द होने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने अंक तय करने के लिए इसी नीति को मंजूरी दी है। हाईकोर्ट को यह जानकारी देते हुए सीबीएसई ने दायर चुनौती याचिका को रद्द करने का आग्रह किया है। याची ने याचिका में बच्चों के हित में इस नीति में संशोधन की मांग की है।
मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल व न्यायमूर्ति ज्योति सिंह की खंडपीठ के समक्ष सीबीएसई के परीक्षा नियंत्रक द्वारा पेश जवाब में कहा गया है कि रिजल्ट तय करने के लिए रिजल्ट कमेटी बनाई गई है और इसमें स्कूल प्रधानाचार्य के अलावा सात अन्य शिक्षक शामिल हैं, जो सभी विषयों के हैं।
100 अंकों में से किया जाएगा मूल्यांकन
उन्होंने कहा कि कोरोना महामारी के चलते विपरीत परिस्थितियों में छात्रों के अंक तय किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि तकनीकी व उच्च योग्यता वाले विशेषज्ञों ने जिन्हें पढ़ाने में महारत है, उन्होंने यह नीति तैयार की है। इस मूल्यांकन नीति में बदनियती या भेदभाव की गुंजाइश नहीं है। सामान्य परिस्थितियों में 100 में से 20 अंक स्कूल के आंतरिक मूल्यांकन व 80 अंक बोर्ड परीक्षा पर आधारित होते हैं।
उन्होंने कहा कि वर्तमान में 20 अंक आंतरिक मूल्यांकन के ही रखे गए हैं। इसके अलावा 10 अंक टेस्ट, 30 अंक मध्यावधि परीक्षा व 40 अंक प्री बोर्ड परीक्षा के हैं। उन्होंने कहा कि स्कूल किसी भी प्रकार से बच्चों से भेदभाव नहीं कर सकते व अंकों को वेबसाइट पर डालने से पहले रीजनल कार्यालय में उसे देखा जाएगा और पूरा रिकार्ड भी सुरक्षित रखा जाएगा।
उन्होंने पेश जवाब में इस तर्क को गलत बताया है कि पिछली कक्षाओं में बच्चों के प्रदर्शन के आधार पर 10वीं के छात्र के अंकों का आकलन करने की सीबीएसई नीति असंवैधानिक और भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए), 21 और 21 ए के प्रावधानों का उल्लंघन करती है। उन्होंने कहा 12वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षाएं रद्द होने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने एक मामले में उक्त नीति को 12वीं कक्षा के नतीजे निकालने पर लागू करने की मंजूरी दी है तो ये नीति असंवैधानिक कैसे हो गई।
उन्होंने कहा याची ऐसा एक भी साक्ष्य या उदाहरण नहीं दे पाया कि यह नीति गैरकानूनी, भेदभाव पूर्ण व अव्यवहारिक है। रिजल्ट कमेटी की जिम्मेदारी है कि रिजल्ट निष्पक्ष, बच्चों के हित में हो। ऐसे में दायर याचिका खारिज की जाए। यह याचिका गैर सरकारी संगठन जस्टिस फॉर ऑल ने दायर की है।