किडनी रोगियों के लिए घातक साबित हो रहा कोरोना और ब्लैक फंगल
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किडनी मरीजों का उपचार काफी चुनौतियों से घिरा है। कोरोना महामारी में यह और भी जटिल हो जाता है क्योंकि वायरस का असर किडनी रोगियों पर काफी तेजी से होता है। इसी के साथ ही फंगस भी इन मरीजों के लिए जानलेवा बन रहा है। जो लोग म्यूकोरमाइकोसिस से ठीक हो रहे हैं, उनमें किडनी से जुड़ी समस्याएं होने की बात कही जा रही है। म्यूकोरमाइकोसिस (ब्लैक फंगस) के इलाज में जिन एंटी फंगल दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है, उससे किडनी से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं।
सफदरजंग अस्पताल के नेफ्रोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. हिमांशु वर्मा का कहना है कि मरीजों को दो तरह की दवाएं दी जा रही हैं जिनमें एम्फोटेरेसिन बी एंटी फंगल दवा उन मरीजों को दी जा रही है जिन्हें पहले से किडनी की बीमारी नहीं है। उनकी किडनी पर इस दवा मामूली असर पड़ता है, लेकिन दो से तीन हफ्ते में वह व्यक्ति रिकवर कर जाता है और किडनी भी स्वस्थ हो जाती है। इसी तरह जिन लोगों को किडनी की कोई बीमारी है या किडनी ट्रांसप्लांट हुई है, उनमें यह दवा उनकी बीमारी की रफ्तार को थोड़ा बढ़ा देती है। एक लिपोसोमल एम्फोटेरेसिन बी दवा आती है। इस दवा को ब्लैक फंगस के रोगियों में इस्तेमाल किया जा रहा है, जिनमें पहले से किडनी की बीमारी है। अगर लिपोसोमल वर्जन ना भी हो तो नॉर्मल एम्फोटेरेसिन बी की डोज को कंट्रोल करके मरीज पर इस्तेमाल किया जा सकता है।
इतना ही नहीं कोरोना के 25 से 30 फीसदी मरीजों में किडनी व मूत्र संबंधी विकार भी देखने को मिल रहा है। इन मरीजों में ग्लोमेरुलो नेफ्राइटिस की समस्या सामने आ रही है। इस बीमारी में पेशाब में प्रोटीन और खून का स्त्राव होने लगता है। हालांकि इससे किडनी की कार्यप्रणाली पर असर नहीं पड़ता लेकिन समय पर जांच और उपचार जरूरी है।