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उपराज्यपाल के अधिकार बढ़ाने संबंधी संशोधन को एक और याचिका के जरिये चुनौती

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नई दिल्ली। राजधानी में उपराज्यपाल को असीमित अधिकार प्रदान करने संबंधी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) विधेयक, 2021 को हाईकोर्ट में एक और जनहित याचिका दायर कर चुनौती दी गई है। याचिका में 27 अप्रैल, 2021 को अधिसूचित उक्त संशोधन को असंवैधानिक और अनुच्छेद 14 और 21 के सिद्धांतों का उल्लंघन करने वाला घोषित करने का निर्देश देने की मांग की गई है।
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याचिकाकर्ता नीरज शर्मा ने अधिवक्ता मेघन, नकुल बैसोया और मोहम्मद सुजा फैसल के माध्यम से दायर याचिका में कहा कि यह संशोधन उच्चतम न्यायालय के फैसले के खिलाफ है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा था कि दिल्ली की चुनी हुई सरकार अपने अधिकार क्षेत्र में सभी निर्णय ले सकती है और एलजी की सहमति प्राप्त किए बिना उन पर अमल कर सकती है।
याचिकाकर्ता ने कहा फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया है कि एलजी और सरकार के बीच किसी मामले पर मतभेद के मामले में दोनों को इसे सुलझाने के लिए सभी प्रयास करने चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता तो इस मामले को किसी फैसले के लिए राष्ट्रपति के पास भेजना चाहिए।
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इस याचिका पर मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के समक्ष 24 मई को सुनवाई होगी। इसी मुद्दे को लेकर खंडपीठ ने पहले ही केंद्र व उपराज्यपाल को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था।
याचिका में कहा गया है कि दिल्ली में अधिकारों के मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने अनुच्छेद 239 की व्याख्या करते हुए कहा कि अनुच्छेद 239 का खंड (4) उन मामलों के संबंध में दिल्ली सरकार को स्पष्ट रूप से शक्तियां देता है जिनके लिए विधान सभा को कानून बनाने का अधिकार है। ऐसे में संशोधन अधिनियम इस फैसले का उल्लंघन करता है।
याची ने कहा कोई भी कार्यकारी कार्रवाई करने से पहले उपराज्यपाल की अनिवार्य पूर्व राय मांगने वाला संशोधन अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। लोकतंत्र संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है और इसे किसी भी कीमत पर संशोधित नहीं किया जा सकता।
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