दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में एक फैसले में कहा कि झूठे दुष्कर्म के आरोप आरोपियों के जीवन पर स्थायी घाव छोड़ देते हैं। आरोपियों की तकलीफ को केवल बरी करने या सहानुभूति के शब्दों से मिटाया नहीं जा सकता। न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ ने यह टिप्पणी एक मामले में की, जहां एक महिला ने तीन व्यक्तियों पर सामूहिक बलात्कार का आरोप लगाया था, लेकिन बाद में अपने बयान वापस ले लिए।
महिला ने आरोप लगाया था कि नौकरी दिलाने के बहाने उसे बुलाकर दुष्कर्म किया गया। ट्रायल कोर्ट ने तीनों आरोपियों तोशिब उर्फ पारितोष और दो अन्य को बरी कर दिया था। दिल्ली पुलिस ने इस बरी करने के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन हाईकोर्ट ने 15 दिसंबर को पुलिस की अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि प्रतिष्ठा की हानि, जेल में बंदी, सामाजिक कलंक और मनोवैज्ञानिक आघात जो एक आरोपी को झूठे मामले में झेलना पड़ता है, वह जीवनभर के लिए घाव छोड़ जाते हैं। ऐसे नुकसान को केवल बरी करने के आदेश या सहानुभूति के कुछ शब्दों से पूर्ववत नहीं किया जा सकता।
24 साल पुराने विदेशी मुद्रा तस्करी में तीन आरोपी बरी
राउज एवेन्यू कोर्ट ने करीब 24 साल पुराने विदेशी मुद्रा तस्करी के एक मामले में तीन आरोपियों को बरी कर दिया है। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट नीतू नागर की अदालत ने कहा कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) आरोपों को संदेह से परे साबित करने में नाकाम रही। यह फैसला अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट नीतू नागर की अदालत ने सुनाया। सीबीआई के अनुसार, वर्ष 2001 में सुरजीत सिंह चोपड़ा, हरपाल सिंह चोपड़ा और रवैल सिंह चोपड़ा पर आरोप था कि वे स्पीड पोस्ट पार्सलों के जरिये हांगकांग अवैध रूप से अमेरिकी डॉलर भेज रहे थे। जांच एजेंसी का दावा था कि दो पार्सलों से 25-25 हजार अमेरिकी डॉलर, यानी कुल 50 हजार डॉलर बरामद किए गए थे।
सबूत के अभाव में चेक बाउंस मामले में आरोपी बरी
पटियाला हाउस कोर्ट ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (एनआई एक्ट) की धारा 138 के तहत दर्ज चेक बाउंस मामले में आरोपी नितेश कुमार सिंह को बरी कर दिया है। न्यायिक मजिस्ट्रेट स्नेहिल शर्मा ने अपने फैसले में कहा कि शिकायतकर्ता कथित कर्ज या देनदारी को ठोस और विश्वसनीय सबूतों के माध्यम से साबित करने में पूरी तरह असफल रहा। मामले के अनुसार, शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि नितेश कुमार सिंह ने उसे चेक के माध्यम से भुगतान करना था, लेकिन चेक बाउंस हो गया। शिकायतकर्ता ने केवल चेक और बैंक मेमो अदालत में पेश किए, लेकिन अदालत ने माना कि केवल यह पर्याप्त नहीं है।
पूर्व यूजीसी एलडीसी क्लर्क को तीन साल की जेल
राउज एवेन्यू कोर्ट ने 2013 की क्लर्क भर्ती परीक्षा में धोखाधड़ी के मामले में यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यूजीसी ) के पूर्व लोअर डिविजनल क्लर्क पप्पू कुमार को दोषी ठहराया और तीन साल की सजा सुनाई है। अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट मयंक गोयल ने सजा सुनाते हुए टिप्पणी की कि आरोपी ने जानबूझकर गैरकानूनी तरीके अपनाए और भर्ती प्रक्रिया को धोखा दिया।
अदालत ने कहा कि आरोपी को अपराध की पूरी जानकारी थी, फिर भी उसने अपना जुर्म स्वीकार नहीं किया और लंबे समय तक मुकदमा लड़ा। यह मामला करीब नौ साल तक चला। मामले की शुरुआत जुलाई 2015 में हुई, जब यूजीसी ने एक औपचारिक शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि 2013 में आयोजित लोअर डिविजनल क्लर्क (एलडीसी) भर्ती परीक्षा में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां हुई थीं। यह भर्ती प्रक्रिया एजुकेशनल कंसल्टेंट्स इंडिया लिमिटेड (एडसिल) के जरिए कराई गई थी। लिखित परीक्षा और टाइपिंग टेस्ट के बाद करीब 100 उम्मीदवारों की नियुक्ति हुई थी। यूजीसी को भर्ती किए गए कुछ नए क्लर्कों का कामकाज संतोषजनक नहीं लगा। आंतरिक टाइपिंग टेस्ट में पप्पू कुमार समेत पांच उम्मीदवार तय गति पूरी नहीं कर पाए। इस पर यूजीसी ने उनके हस्ताक्षर, अंगूठे के निशान की फोरेंसिक जांच कराने का फैसला किया। सीएफएसएल रिपोर्ट में पता चला कि परीक्षा के दौरान उपस्थिति शीट पर किए गए हस्ताक्षर और अंगूठे के निशान पप्पू से मेल नहीं खाते थे। इससे साफ हो गया कि लिखित और कौशल परीक्षा में उसकी जगह किसी और व्यक्ति ने परीक्षा दी थी। फोरेंसिक सबूतों के आधार पर यूजीसी ने जुलाई 2015 में पप्पू कुमार और कुछ अन्य उम्मीदवारों की सेवाएं समाप्त कर दीं और मामला सीबीआई को सौंप दिया। सीबीआई की एंटी-करप्शन ब्रांच ने एफआईआर दर्ज कर जांच की और 2019 में चार्जशीट दाखिल की।